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Moral Stories in Hindi: बच्चों के लिए 50 नैतिक कहानियाँ

Moral Stories in Hindi · 3–7 साल

Moral stories in Hindi — बच्चों के लिए 50 नैतिक कहानियाँ, जो बिना डाँटे सच, दया और हिम्मत सिखाती हैं।

भारतीय घरों, स्कूलों और पार्कों में रची 50 कहानियाँ, 5 श्रेणियों में बँटी हुई — हर श्रेणी में 10 कहानियाँ। हर कहानी के अंत में उसकी सीख।

  • 50 कहानियाँ
  • 5 श्रेणियाँ
  • 3–4 मिनट हर कहानी
  • हर कहानी की सीख

हर माता-पिता इस पल को जानते हैं — बच्चे ने किसी का खिलौना छीन लिया, छोटा-सा झूठ बोल दिया, या अपनी चीज़ बाँटने से मना कर दिया, और आप समझाने बैठ जाते हैं। पर छोटे बच्चे भाषण से कम और कहानियों से ज़्यादा सीखते हैं। बच्चों के लिए नैतिक कहानियाँ ऐसी छोटी कहानियाँ होती हैं जिनमें कोई पात्र एक फ़ैसला लेता है, उसका नतीजा देखता है, और चुपचाप बच्चे को दिखा देता है कि सच, दया या हिम्मत असल में कैसी दिखती है।

ये शिक्षाप्रद कहानियाँ 3 से 7 साल के बच्चों के माता-पिता के लिए लिखी गई हैं। इनके पात्र आपके बच्चों जैसे ही हैं — रिया, आरव, कबीर, अनाया — जो कॉलोनी में रहते हैं, जहाँ गली के कोने पर दुकान है, दादी कहानियाँ सुनाती हैं और स्कूल बस किसी का इंतज़ार नहीं करती। इन्हें सोते समय, खाना खाते हुए या सफ़र में सुनाइए। हर कहानी पढ़कर सुनाने में तीन-चार मिनट लगते हैं।

इस पेज को कैसे इस्तेमाल करें: नीचे दी गई सूची से वह कहानी चुनें जिसका गुण आप सिखाना चाहते हैं, उसे अपनी आवाज़ में पढ़कर सुनाएँ, फिर अंत में सीख बताएँ। बस — बाकी काम कहानी खुद कर देगी।

Moral Stories in Hindi: 50 नैतिक कहानियों की सूची

नैतिक कहानियाँ भाषण से बेहतर क्यों काम करती हैं

“हमेशा सच बोलो” — यह नियम बच्चे को धुँधला लगता है। कहानी इसे सामने ला देती है: बच्चा रिया को टूटे फूलदान के पास खड़ा देखता है, उसकी धड़कन महसूस करता है, और देखता है कि सच बोलने पर क्या होता है। बच्चे नियम भूल जाते हैं, पर कहानी की भावना लंबे समय तक याद रखते हैं।

साथ बैठकर कहानी पढ़ना सिर्फ़ अच्छे गुण ही नहीं सिखाता। अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स माता-पिता को बचपन से ही बच्चों को पढ़कर सुनाने की सलाह देती है, क्योंकि इससे भाषा मज़बूत होती है और माता-पिता व बच्चे का रिश्ता गहरा होता है। रोज़ की एक नैतिक कहानी आपको दोनों देती है — दस मिनट का प्यारा साथ, और एक सीख जो याद रहती है।

बच्चे की उम्र के हिसाब से सही कहानी कैसे चुनें

0–2

कहानी से ज़्यादा लय। आवाज़ों और हाव-भाव वाली एक-दो लाइन की कहानियाँ (“चिड़िया ने पानी पिया — गट-गट!”)। ख़ुशी वाला अंत ही सीख है।

3–4

एक पात्र, एक फ़ैसला। छोटी कहानियाँ जैसे प्यासी चिड़िया या अँधेरे का राक्षस। सीख को चार-पाँच शब्दों में बताएँ।

5–7

भावनाएँ और नतीजे। ऐसी कहानियाँ जिनमें बच्चा उलझन में पड़ता है — दस रुपये ज़्यादा, कियारा के पहिए। बाद में “क्यों” वाले सवाल पूछें।

ईमानदारी पर बच्चों की नैतिक कहानियाँ

1

टूटा फूलदान

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

रिया सात साल की थी और उसे गेंद से खेलना सबसे ज़्यादा पसंद था। मम्मी ने कई बार कहा था, “रिया, गेंद से घर के अंदर मत खेला करो, बाहर आँगन में खेलो।” पर उस दिन बाहर बहुत धूप थी, इसलिए रिया ने सोचा, “बस थोड़ी देर कमरे में ही खेल लेती हूँ।”

वह दीवार पर गेंद मारती और लपकती। तप्प-तप्प, तप्प-तप्प। अचानक गेंद उसके हाथ से फिसली और सीधी मेज़ पर रखे नीले फूलदान से टकरा गई। “छनाक!” फूलदान ज़मीन पर गिरकर टुकड़े-टुकड़े हो गया। यह वही फूलदान था जो नानी ने मम्मी को शादी में दिया था।

रिया का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। कमरे के कोने में उनकी बिल्ली मिनी सो रही थी, जो आवाज़ सुनकर उठ बैठी। तभी रिया के मन में एक ख़याल आया, “मैं कह दूँगी कि मिनी ने गिराया। बिल्ली तो बोल भी नहीं सकती!”

मिनी पर शक

मम्मी रसोई से दौड़ती हुई आईं। टूटा फूलदान देखकर उनका चेहरा उदास हो गया। उन्होंने मिनी की तरफ़ देखा और बोलीं, “मिनी, क्या तूने किया?” बेचारी मिनी डर के मारे पलंग के नीचे छिप गई। उसकी काँपती हुई आँखें देखकर रिया का मन भर आया। उसे लगा कि अगर वह चुप रही, तो मिनी को बिना गलती के डाँट पड़ेगी।

रिया ने गहरी साँस ली और धीरे से बोली, “मम्मी, मिनी ने नहीं किया। मैं कमरे में गेंद से खेल रही थी और मुझसे टूट गया। आपने मना भी किया था। सॉरी।” कहते-कहते उसकी आँखों में आँसू आ गए।

मम्मी कुछ पल चुप रहीं। फिर वे घुटनों के बल बैठीं और रिया को गले लगा लिया। “मुझे फूलदान टूटने का दुख है, बेटा, पर तुमने जो सच बोला, उसकी खुशी उससे कहीं ज़्यादा है। फूलदान नया आ सकता है, पर भरोसा एक बार टूट जाए तो आसानी से नहीं जुड़ता।”

दोनों ने मिलकर सावधानी से टुकड़े उठाए। मिनी भी पलंग के नीचे से निकली और रिया की गोद में आकर बैठ गई। उस दिन के बाद रिया हमेशा आँगन में ही गेंद से खेलती थी, और जब भी कोई गलती होती, सबसे पहले खुद मम्मी को बता देती।

कहानी की सीख

गलती हो जाए तो सच बोलो। अपनी गलती का इल्ज़ाम किसी और पर लगाना सबसे बड़ी गलती है।

2

सुनहरी पेंसिल

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

गोलू को नई-नई चीज़ें बहुत पसंद थीं। उसके पास एक साधारण-सी पीली पेंसिल थी, जो घिसते-घिसते छोटी हो गई थी। एक सुबह क्लास में झाड़ू लगने के बाद, उसने अपनी बेंच के नीचे कुछ चमकता हुआ देखा। वह एक सुनहरी पेंसिल थी, जिसके ऊपर छोटा-सा चमकीला स्टार लगा था और नीचे गुलाबी रबर।

गोलू ने इधर-उधर देखा। कोई उसे नहीं देख रहा था। उसके मन ने कहा, “यह पेंसिल तो मेरी बेंच के नीचे मिली है, तो मेरी ही हुई ना?” उसने चुपके से पेंसिल अपने बस्ते की सामने वाली जेब में रख ली। पूरे पहले पीरियड में उसका ध्यान बार-बार उसी जेब पर जाता रहा।

लंच में उसने देखा कि पीछे की बेंच पर सना सिर झुकाए बैठी थी। उसकी आँखें लाल थीं। उसकी सहेली ने पूछा, “क्या हुआ?” सना सिसकते हुए बोली, “मेरी नानी ने मेरे जन्मदिन पर एक सुनहरी पेंसिल दी थी। वह खो गई। नानी अब गाँव चली गई हैं… वही उनकी याद थी।”

नानी का तोहफ़ा

गोलू के पेट में जैसे कुछ अजीब-सा हुआ। जो पेंसिल उसे ख़ज़ाना लग रही थी, वह किसी की नानी का प्यार थी। उसने सोचा, “अगर मेरी कोई प्यारी चीज़ खो जाती, तो मुझे कैसा लगता?” उसने बस्ते से पेंसिल निकाली और सना के पास गया।

“सना, यह मुझे मेरी बेंच के नीचे मिली थी। मैंने… मैंने इसे रख लिया था। सॉरी।” सना का चेहरा खिल उठा। उसने पेंसिल सीने से लगा ली और बोली, “थैंक यू, गोलू! तुम सच्चे दोस्त हो।”

टीचर ने यह सब देख लिया था। छुट्टी से पहले उन्होंने पूरी क्लास के सामने कहा, “आज गोलू ने एक बहुत बड़ा काम किया। गलती सबसे होती है, पर उसे सुधारना हिम्मत का काम है।” उन्होंने गोलू की कॉपी पर एक बड़ा-सा स्टार बनाया। गोलू को लगा कि यह स्टार सुनहरी पेंसिल से भी ज़्यादा चमक रहा है।

कहानी की सीख

जो चीज़ हमारी नहीं है, उसे उसके मालिक को लौटा देना चाहिए। किसी की चीज़ के पीछे उसकी यादें और भावनाएँ भी होती हैं।

3

दस रुपये ज़्यादा

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

रविवार की सुबह थी। आरव पापा के साथ गली के कोने वाली शर्मा चाचा की दुकान पर दूध, ब्रेड और अंडे लेने गया। पापा ने आरव से कहा, “आज पैसे तुम दोगे और छुट्टे भी तुम गिनोगे।” आरव खुश हो गया, उसे बड़ों वाला काम करना अच्छा लगता था।

दुकान पर बहुत भीड़ थी। शर्मा चाचा एक साथ कई ग्राहकों को सामान दे रहे थे। आरव ने सौ रुपये का नोट दिया। सामान के बावन रुपये हुए, तो उसे अड़तालीस रुपये वापस मिलने चाहिए थे। चाचा ने जल्दी-जल्दी नोट और सिक्के उसके हाथ में रख दिए।

घर के रास्ते में आरव ने पैसे गिने — दस, बीस, तीस, चालीस, पचास, अठ्ठावन! दस रुपये ज़्यादा थे। उसके मन में तुरंत आया, “दस रुपये में तो दो टॉफ़ियाँ और एक गुब्बारा आ जाएगा!” पर फिर उसने सोचा, “ये पैसे मेरे नहीं हैं। चाचा ने गलती से दिए हैं। शाम को जब वे गिनेंगे, तो उनके पैसे कम निकलेंगे।”

वापस दुकान की ओर

आरव रुक गया और पापा का हाथ खींचा। “पापा, वापस चलो। चाचा ने दस रुपये ज़्यादा दे दिए हैं।” पापा ने मुस्कुराकर पूछा, “तुम चाहो तो रख भी सकते थे, किसी को पता भी नहीं चलता।” आरव ने सिर हिलाया, “पर मुझे तो पता होता, पापा।”

दोनों वापस दुकान पर गए। आरव ने दस रुपये का नोट आगे बढ़ाया, “चाचा, आपने गलती से ज़्यादा दे दिए थे।” शर्मा चाचा हैरान हो गए। फिर उन्होंने आरव के सिर पर हाथ रखा और सारे ग्राहकों से बोले, “देखिए, इतना छोटा बच्चा और इतना बड़ा दिल! ऐसे ईमानदार ग्राहक रोज़ नहीं मिलते।”

उस दिन के बाद जब भी आरव दुकान पर जाता, शर्मा चाचा उसे “ईमानदार साहब” कहकर बुलाते। घर लौटते हुए पापा ने कहा, “आज तुमने दस रुपये नहीं लौटाए, आरव। तुमने अपना नाम कमाया है।”

कहानी की सीख

ईमानदारी तब भी ज़रूरी है जब कोई नहीं देख रहा। सच्चे इंसान की पहचान छोटी-छोटी बातों से होती है।

4

होमवर्क का बहाना

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

कबीर को कार्टून देखना बहुत पसंद था। उस रात टीवी पर उसका पसंदीदा सुपरहीरो वाला शो आ रहा था। मम्मी ने पूछा, “कबीर, होमवर्क हो गया?” कबीर ने बिना सोचे कह दिया, “हाँ, मम्मी!” और फिर से टीवी में खो गया। शो खत्म होते ही उसे नींद आ गई।

अगली सुबह स्कूल में मैडम ने कहा, “सब अपनी हिंदी की कॉपी निकालो।” कबीर का चेहरा पीला पड़ गया। उसने तो एक लाइन भी नहीं लिखी थी। जब मैडम उसकी बेंच तक आईं, तो उसके मुँह से अचानक निकला, “मैडम, मेरी कॉपी कुत्ता खा गया!”

पूरी क्लास ठहाके मारकर हँस पड़ी। उसका पड़ोसी दोस्त निखिल तो ज़ोर से बोल पड़ा, “पर कबीर, तेरे घर तो कुत्ता है ही नहीं! तेरे घर तो सिर्फ़ एक गोल्डफ़िश है!” कबीर का चेहरा टमाटर जैसा लाल हो गया। उसे इतनी शर्म आई कि वह सिर झुकाकर बैठ गया।

मैडम ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी कॉपी पर लिख दिया — “कल मिलना।” पूरे दिन कबीर का मन किसी खेल में नहीं लगा। घर आकर उसने पहले होमवर्क किया — साफ़-सुथरी लिखावट में, ध्यान से। फिर उसने मम्मी को सब सच-सच बता दिया। मम्मी ने कहा, “अच्छा किया कि तुमने मुझे बताया। अब कल मैडम को भी बता देना।”

अगले दिन कबीर स्टाफ़ रूम के बाहर खड़ा था। हिम्मत जुटाकर वह बोला, “मैडम, कुत्ते वाली बात झूठ थी। मैं कार्टून देखता रह गया था। यह रहा मेरा होमवर्क। अब से पहले होमवर्क, फिर टीवी।” मैडम मुस्कुराईं और कॉपी पर लिखा — “सच बोलने के लिए शाबाश!” उस दिन कबीर को लगा कि सच बोलने का रास्ता झूठ वाले रास्ते से कहीं आसान है।

कहानी की सीख

बहाने से इज़्ज़त नहीं मिलती। अपनी गलती मानना और उसे सुधारना ही सच्ची हिम्मत है।

5

नक़ली बुखार

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

मीरा का उस सुबह स्कूल जाने का बिल्कुल मन नहीं था। रात बारिश हुई थी, मौसम ठंडा था, और रज़ाई में लिपटे रहना कितना अच्छा लग रहा था! जब मम्मी उसे उठाने आईं, तो मीरा ने आवाज़ धीमी करके कहा, “मम्मी, मुझे बुखार लग रहा है… सिर भी दर्द कर रहा है।”

मम्मी ने उसके माथे पर हाथ रखा। माथा बिल्कुल ठीक था, पर मम्मी ने कुछ नहीं कहा। बस इतना बोलीं, “ठीक है, आज घर पर आराम करो। बुखार में टीवी और फ़ोन नहीं, सिर्फ़ आराम और खिचड़ी।” मीरा को पहले तो मज़ा आया, पर दो घंटे बिस्तर पर लेटे-लेटे वह बोर होने लगी। घड़ी की सुइयाँ जैसे रुक गई थीं।

दोपहर में उसकी सहेली तान्या का फ़ोन आया। वह खुशी से चहक रही थी, “मीरा, तू कहाँ थी? आज स्कूल में जादूगर आया था! उसने टोपी से खरगोश निकाला, और फिर सब बच्चों को आइसक्रीम मिली। अगले हफ़्ते के डांस शो के नाम भी आज ही लिखे गए।”

डांस की लिस्ट

मीरा की आँखें भर आईं। डांस उसका सबसे पसंदीदा काम था, और उसका नाम उस लिस्ट में नहीं था क्योंकि वह स्कूल गई ही नहीं। उसे लगा कि उसका झूठ उसी को नुकसान पहुँचा गया।

शाम को वह मम्मी के पास गई और उनकी गोद में सिर रखकर बोली, “मम्मी, मुझे बुखार नहीं था। मैं बस स्कूल नहीं जाना चाहती थी। सॉरी।” मम्मी ने उसके बाल सहलाए, “मुझे पता था, बेटा। मैं चाहती थी कि तुम खुद समझो। अगली बार अगर स्कूल जाने का मन न हो, तो सीधे मुझसे कहना — हम मिलकर वजह ढूँढेंगे।”

अगले दिन मीरा सबसे पहले तैयार होकर स्कूल पहुँची और टीचर से डांस में नाम लिखवाने की विनती की। टीचर ने उसे आख़िरी जगह दे दी। उस दिन से मीरा ने कभी नक़ली बुखार का बहाना नहीं बनाया।

कहानी की सीख

झूठ बोलकर हम अक्सर अपना ही नुकसान करते हैं। मन की बात सच-सच कहो, तो बड़े हमेशा मदद करते हैं।

6

गुड़िया का गुलाबी जूता

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

अनाया अपनी सहेली परी के घर पहली बार खेलने गई थी। परी के कमरे में खिलौनों की पूरी अलमारी भरी थी — गुड़ियाँ, टेडी बियर, छोटा-सा रसोई सेट। सबसे सुंदर थी एक गुड़िया, जिसने रेशमी फ़्रॉक और छोटे-छोटे गुलाबी जूते पहने थे।

दोनों ने घंटों गुड़िया की शादी का खेल खेला। जब परी अपनी मम्मी से बिस्कुट लेने गई, तो अनाया ने गुड़िया का एक गुलाबी जूता हाथ में लिया। वह इतना प्यारा था कि उसका मन किया उसे अपने पास रख ले। उसने सोचा, “परी के पास तो इतने सारे खिलौने हैं, एक छोटा-सा जूता किसे याद रहेगा?” और उसने जूता चुपके से अपनी फ़्रॉक की जेब में डाल लिया।

घर लौटते समय जेब में वह नन्हा-सा जूता उसे बहुत भारी लगने लगा, जैसे कोई पत्थर हो। रात के खाने में उसकी पसंदीदा आलू की सब्ज़ी बनी थी, पर उसका मन नहीं लगा। बिस्तर पर लेटी तो उसे परी का चेहरा याद आया। अगर परी अपनी गुड़िया का जूता ढूँढेगी तो? अगर वह रोएगी तो?

जेब में छिपा जूता

मम्मी ने देखा कि अनाया उदास है। उन्होंने पास बैठकर पूछा, “क्या बात है, मेरी गुड़िया?” अनाया ने धीरे से जेब से जूता निकाला और सब बता दिया। मम्मी ने डाँटा नहीं। वे बोलीं, “देखा, तुम्हारा दिल खुद तुम्हें बता रहा है कि यह गलत था। यही तो अच्छे बच्चे की निशानी है। अब इसे ठीक कैसे करें?”

अगले दिन अनाया मम्मी के साथ परी के घर गई। उसने जूता लौटाते हुए कहा, “परी, मैंने यह बिना पूछे ले लिया था। सॉरी।” परी ने बड़ी-बड़ी आँखें करके कहा, “मैं तो कल से इसे ढूँढ रही थी!” फिर वह मुस्कुराई, “तुमने सच बताया, यह बहुत अच्छी बात है। चलो, आज गुड़िया का जन्मदिन मनाते हैं!”

उस दिन अनाया का मन इतना हल्का हो गया कि उसे लगा वह उड़ सकती है। वापस आते समय उसने मम्मी से कहा, “मम्मी, चुराई हुई चीज़ भारी लगती है और लौटाई हुई चीज़ का मन हल्का कर देती है।”

कहानी की सीख

किसी की चीज़ लेनी हो तो पहले पूछो। गलती हो जाए तो उसे सुधारने में देर मत करो।

7

झाँकने वाला विहान

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

शाम को सोसायटी के पार्क में सारे बच्चे जमा होते थे। उस दिन सबने तय किया कि छुपन-छुपाई खेलेंगे। विहान को यह खेल बहुत पसंद था, पर उसे हारना बिल्कुल पसंद नहीं था। जब उसकी गिनती करने की बारी आई, तो उसने पेड़ की तरफ़ मुँह किया और आँखों पर हाथ रखे।

“एक… दो… तीन…” वह गिनता रहा, पर उसकी उँगलियों के बीच थोड़ी-सी जगह खुली थी। वह चुपके से देख रहा था कि कौन कहाँ जा रहा है — रिया स्लाइड के पीछे, कबीर बेंच के नीचे, और छोटी पिंकी गार्ड अंकल की कुर्सी के पीछे। “दस! आ रहा हूँ!” विहान ने एक मिनट में सबको ढूँढ लिया।

पहली बार तो सबने सोचा कि विहान बहुत होशियार है। पर जब दूसरी और तीसरी बार भी ऐसा ही हुआ, तो रिया ने कहा, “रुको! मैंने देखा, तुम उँगलियों के बीच से झाँक रहे थे!” कबीर ने भी कहा, “हाँ, इसीलिए तो तुम सीधे हमारी जगह पर आते हो। यह चीटिंग है। हम तुम्हारे साथ नहीं खेलेंगे।”

जीत, पर अकेलापन

सारे बच्चे झूले की तरफ़ चले गए। विहान अकेला पेड़ के पास खड़ा रह गया। उसने सोचा था कि जीतने में मज़ा आएगा, पर अब तो कोई उसके साथ खेल ही नहीं रहा था। उसे समझ आया कि जिस जीत में दोस्त ही न हों, वह जीत किस काम की।

वह धीरे-धीरे उनके पास गया और बोला, “हाँ, मैंने झाँका था। मैं हारना नहीं चाहता था। सॉरी। क्या मुझे एक मौका और दोगे? इस बार मैं आँखें कसकर बंद करूँगा।” बच्चों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। फिर रिया बोली, “ठीक है, पर इस बार पक्का ईमानदारी से!”

इस बार विहान ने आँखें कसकर बंद कीं और पूरे बीस तक गिनती की। सबको ढूँढने में उसे पाँच मिनट लग गए, और पिंकी तो उसे मिली ही नहीं! पर अजीब बात यह थी कि इस बार उसे सबसे ज़्यादा मज़ा आया। सब हँसते-खिलखिलाते अँधेरा होने तक खेलते रहे।

कहानी की सीख

खेल का असली मज़ा ईमानदारी से खेलने में है। चीटिंग से जीत तो मिल सकती है, पर दोस्त खो जाते हैं।

8

बातूनी तोता मिट्ठू

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

चिंटू के घर में एक हरा तोता था, जिसका नाम था मिट्ठू। मिट्ठू की एक ख़ास आदत थी — वह घर में जो भी सुनता, उसे दोहरा देता। अगर पापा कहते “चाय बना दो”, तो मिट्ठू भी चिल्लाता “चाय बना दो! चाय बना दो!” सब उसकी बातों पर हँसते रहते।

एक दिन दादी ने दिवाली के लिए बेसन के लड्डू बनाए और उन्हें एक डिब्बे में रखकर कहा, “ये पूजा के लिए हैं, कोई अभी नहीं खाएगा।” चिंटू से रहा नहीं गया। जब दादी नहाने गईं, तो वह चुपके से रसोई में गया, डिब्बा खोला और गपागप दो लड्डू खा गया। मिट्ठू पिंजरे से सब देख रहा था।

दादी लौटीं तो उन्होंने लड्डू गिने — दो कम थे। “लड्डू किसने खाए?” उन्होंने पूछा। चिंटू ने मुँह पोंछा और बड़ी मासूमियत से बोला, “मुझे नहीं पता, दादी। शायद कोई चूहा आया होगा।” तभी पिंजरे से आवाज़ आई, “चिंटू ने खाया! चिंटू ने खाया! लड्डू गपागप!”

हँसी और शर्मिंदगी

पूरा घर हँसी से गूँज उठा। पापा हँसते-हँसते कुर्सी से गिरते-गिरते बचे, और दीदी ने ताली बजाई। पर चिंटू का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसे लड्डू खाने से ज़्यादा शर्म इस बात पर आई कि उसने झूठ बोला था।

दादी ने उसे पास बुलाया और प्यार से कहा, “चिंटू, अगर तुम माँग लेते, तो मैं खुद तुम्हें एक लड्डू दे देती। लड्डू खाना उतनी बड़ी गलती नहीं थी, जितना झूठ बोलना। और देखो, झूठ तो तोता भी पकड़ लेता है!” चिंटू ने कान पकड़कर सॉरी बोला। उसी पल मिट्ठू भी चिल्लाया, “सॉरी! सॉरी!” और सब फिर हँस पड़े।

उस दिन के बाद चिंटू को जब भी कुछ चाहिए होता, वह पहले पूछता। और पूजा के बाद दादी ने सबसे पहला लड्डू उसी को दिया।

कहानी की सीख

झूठ ज़्यादा दिन नहीं छिपता। जो चाहिए हो, वह माँग लो; चुपके से लेकर झूठ बोलने से गलती दोगुनी हो जाती है।

9

पार्क में मिला बटुआ

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

रविवार की सुबह सारा और उसके बड़े भैया अर्जुन पार्क में साइकिल चला रहे थे। थककर जब वे एक बेंच पर बैठे, तो सारा को बेंच के कोने में एक पुराना भूरा बटुआ दिखा। अर्जुन ने उसे खोला — उसमें कुछ नोट थे, एक पुरानी फ़ोटो, और एक पर्ची जिस पर काँपते हाथों से लिखा था — “दवाई के पैसे — सोमवार।”

अर्जुन के दोस्त मोनू ने दूर से देखा और पास आकर बोला, “अरे वाह! इतने सारे पैसे! किसी को पता नहीं चलेगा, चलो आइसक्रीम और वीडियो गेम की पार्टी करते हैं!” एक पल के लिए अर्जुन भी सोच में पड़ गया।

तभी सारा ने पर्ची की तरफ़ इशारा किया, “भैया, देखो ना, ये किसी की दवाई के पैसे हैं। अगर उन्हें दवाई नहीं मिली तो?” अर्जुन को अपनी दादी याद आ गईं, जो रोज़ दवाई लेती थीं। उसने मोनू से कहा, “नहीं मोनू, ये हमारे पैसे नहीं हैं। हम इसे इसके मालिक तक पहुँचाएँगे।”

गार्ड अंकल के पास

दोनों भाई-बहन पार्क के गेट पर बैठे गार्ड अंकल के पास गए और सारी बात बताई। गार्ड अंकल ने कहा, “यहीं रुको, जिसका बटुआ है वह ज़रूर ढूँढते हुए आएगा।” कुछ ही देर में एक बूढ़े दादा जी लाठी टेकते हुए, घबराए हुए आए। “मेरा बटुआ कहीं गिर गया… उसमें मेरी दवाइयों के पैसे थे और मेरी पत्नी की आख़िरी फ़ोटो…”

सारा ने बटुआ उनके हाथ में रख दिया। दादा जी ने सबसे पहले फ़ोटो देखी और उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने दोनों के सिर पर हाथ रखा, “तुमने आज मेरी दवाई ही नहीं, मेरी सबसे कीमती याद भी लौटा दी। भगवान तुम्हें खुश रखे।” मोनू यह सब देख रहा था। उसने धीरे से कहा, “अर्जुन, तू सही था। आइसक्रीम का मज़ा इतनी देर नहीं टिकता जितना यह खुशी टिकेगी।”

कहानी की सीख

किसी की खोई हुई चीज़ उसे लौटाना सबसे बड़ी भलाई है। गलत रास्ते पर ले जाने वाले दोस्त की बात नहीं, अपने दिल की सच्ची आवाज़ सुनो।

10

छिपा हुआ रिपोर्ट कार्ड

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • ईमानदारी और सच

सोनू को ड्रॉइंग और खेल-कूद बहुत पसंद था, पर गणित उसे हमेशा एक उलझी हुई पहेली लगती थी। जिस दिन रिपोर्ट कार्ड मिला, सोनू ने देखा — ड्रॉइंग में “A+”, खेल में “A”, पर गणित में लाल स्याही से लिखा था — “सुधार की ज़रूरत।”

घर के रास्ते भर सोनू का दिल धक-धक करता रहा। “पापा गुस्सा करेंगे। मम्मी उदास होंगी।” घर पहुँचते ही उसने रिपोर्ट कार्ड अलमारी के पीछे, पुराने अख़बारों के नीचे छिपा दिया। जब मम्मी ने पूछा, “रिपोर्ट कार्ड आया?” तो सोनू ने कहा, “अभी नहीं, अगले हफ़्ते आएगा।”

उस रात सोनू को नींद नहीं आई। उसे लगता रहा कि अलमारी के पीछे से रिपोर्ट कार्ड उसे घूर रहा है। सपने में उसने देखा कि गणित के अंक राक्षस बनकर उसका पीछा कर रहे हैं। सुबह उसकी आँखें लाल थीं और मन बहुत भारी। उसे समझ आया कि छिपाने से डर कम नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ गया।

पापा के सामने सच

नाश्ते के बाद सोनू अख़बारों के नीचे से रिपोर्ट कार्ड निकाल लाया और सिर झुकाकर पापा को दे दिया। “पापा, यह कल ही आ गया था। मैंने डर के मारे छिपा दिया था और मम्मी से झूठ भी बोला। सॉरी।” पापा ने रिपोर्ट कार्ड देखा, फिर सोनू को देखा। उन्होंने डाँटा नहीं। “ड्रॉइंग में A+! वाह! और गणित… उसे हम मिलकर ठीक करेंगे। पर अगली बार छिपाना नहीं — कम नंबर से तुम बुरे बच्चे नहीं बन जाते।”

उस दिन से हर शाम पापा सोनू के साथ गणित के खेल खेलते — कभी चॉकलेट बाँटकर भाग सिखाते, कभी सीढ़ियाँ गिनकर जोड़। सोनू ने अपनी कॉपी में गणित के अंकों के मज़ेदार चित्र भी बनाए। अगले रिपोर्ट कार्ड में गणित के आगे लिखा था — “बहुत अच्छा सुधार!” और इस बार सोनू दौड़ता हुआ सबसे पहले उसे घर में दिखाने आया।

कहानी की सीख

सच बताने से मदद मिलती है, छिपाने से डर बढ़ता है। कमज़ोरी से शर्माओ मत, उसे मेहनत से ताक़त बनाओ।

दया और मदद की नैतिक कहानियाँ

11

प्यासी चिड़िया

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

मई का महीना था और धूप इतनी तेज़ थी कि सड़कें भी गरम तवे जैसी लग रही थीं। दोपहर में पिंकी कूलर के सामने बैठकर ठंडा निंबू पानी पी रही थी। तभी उसकी नज़र बालकनी की रेलिंग पर पड़ी। वहाँ एक छोटी-सी भूरी चिड़िया बैठी थी, चोंच खोलकर ज़ोर-ज़ोर से हाँफ रही थी।

पिंकी ने दादी से पूछा, “दादी, यह चिड़िया ऐसे मुँह खोलकर क्यों बैठी है?” दादी ने कहा, “बेटा, इसे बहुत प्यास लगी है। हमारे पास तो नल और फ़्रिज है, पर इन बेचारे पक्षियों को गर्मी में पानी ढूँढने में बहुत मुश्किल होती है। तालाब और गड्ढे सब सूख जाते हैं।”

पिंकी का मन उदास हो गया। उसने सोचा, “अगर मुझे इतनी गर्मी में पानी न मिले, तो मुझे कैसा लगेगा?” वह दौड़कर रसोई में गई और मम्मी से एक पुराना मिट्टी का कटोरा माँगा। उसमें साफ़ पानी भरा और बालकनी में पौधों की छाँव में धीरे से रख दिया। फिर वह पर्दे के पीछे छिपकर देखने लगी।

चिड़िया का स्नान

कुछ ही पलों में चिड़िया फुदककर कटोरे के किनारे आई। उसने एक घूँट पिया, फिर दूसरा, फिर पानी में उछल-उछलकर नहाने लगी! पिंकी खिलखिलाकर हँस पड़ी। चिड़िया “चीं-चीं” करती हुई उड़ गई।

अगले दिन सुबह पिंकी ने बालकनी में झाँका — कटोरे के पास एक नहीं, पूरी पाँच चिड़ियाँ बैठी थीं! वह चिड़िया अपनी सहेलियों को भी ले आई थी। पिंकी ने कटोरे के पास थोड़े दाने भी रख दिए। अब हर सुबह पिंकी का सबसे पहला काम होता — कटोरे में ताज़ा पानी भरना। और बदले में उसे हर सुबह चिड़ियों का मीठा गाना सुनने को मिलता।

उसने अपनी सहेलियों को भी यह बात बताई। कुछ ही दिनों में पूरी सोसायटी की बालकनियों में पानी के कटोरे रखे दिखने लगे।

कहानी की सीख

पशु-पक्षी बोल नहीं सकते, इसलिए उनका ध्यान रखना हमारी ज़िम्मेदारी है। एक छोटा-सा अच्छा काम दूसरों को भी अच्छा करना सिखाता है।

12

वणक्कम, लक्ष्मी!

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

नए सत्र के पहले हफ़्ते क्लास में एक नई लड़की आई — लक्ष्मी। उसके पापा का तबादला चेन्नई से हुआ था। उसके लंबे बालों में चमेली के फूल लगे थे और वह हिंदी थोड़ी-सी ही बोल पाती थी। जब टीचर ने उससे नाम पूछा, तो उसने धीरे से जवाब दिया और कुछ बच्चे उसके उच्चारण पर हँस पड़े।

लंच में सब बच्चे अपने-अपने दोस्तों के साथ बैठ गए। लक्ष्मी अकेली खिड़की के पास वाली बेंच पर बैठी रही। उसने अपना टिफ़िन खोला भी नहीं। उसकी आँखें बार-बार दरवाज़े की तरफ़ जा रही थीं, जैसे वह चाह रही हो कि जल्दी से छुट्टी हो जाए।

आरव ने उसे देखा। उसे याद आया कि पिछले साल जब वह नानी के शहर वाले समर कैंप में गया था, तो वहाँ किसी को नहीं जानता था और उसे कितना अकेलापन लगा था। वह अपना टिफ़िन उठाकर उसके पास गया और मुस्कुराकर बोला, “नमस्ते! मैं आरव। मेरे आलू के पराठे खाओगी?”

लक्ष्मी का चेहरा खिल गया। उसने अपना टिफ़िन खोला — उसमें नरम-नरम इडली और नारियल की चटनी थी। “तुम इडली खाओगे?” दोनों ने खाना बाँटा। फिर लक्ष्मी ने हँसकर सिखाया, “तमिल में ‘नमस्ते’ को ‘वणक्कम’ कहते हैं, और ‘धन्यवाद’ को ‘नन्रि’।” आरव ने कोशिश की, गलत बोला, और दोनों हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।

उन्हें हँसता देखकर दूसरे बच्चे भी पास आ गए। सबने बारी-बारी “वणक्कम” बोलकर देखा। जो बच्चे सुबह हँसे थे, उन्होंने भी सॉरी कहा। अगले दिन लक्ष्मी सबके लिए घर से आई नारियल की मिठाई लाई। और साल के अंत तक, आरव और लक्ष्मी क्लास के सबसे पक्के दोस्त बन गए — ऐसे दोस्त जो एक-दूसरे को दो भाषाओं में “धन्यवाद” कहते थे।

कहानी की सीख

नए लोगों का प्यार से स्वागत करो। अलग भाषा, अलग खाना — यह सब हँसने की नहीं, सीखने की चीज़ें हैं।

13

दादी का खोया चश्मा

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

शाम का समय था। दादी को अपनी रामायण की किताब पढ़नी थी, पर उनका चश्मा नहीं मिल रहा था। वे धीरे-धीरे पूरे घर में घूम रही थीं — तकिए के नीचे देखा, अलमारी में देखा, रसोई में देखा। उनके घुटनों में दर्द था, इसलिए हर बार झुकने पर वे “हाय राम” कहतीं।

कबीर सोफ़े पर बैठा अपना पसंदीदा कार्टून देख रहा था। दादी ने उससे कुछ नहीं कहा, बस धीरे से बुदबुदाईं, “कहाँ चला गया मेरा चश्मा… अब कैसे पढ़ूँगी…” कबीर को पहले लगा कि कार्टून खत्म होने के बाद मदद कर देगा। पर फिर उसने देखा कि दादी सीढ़ियों की तरफ़ जा रही हैं, और सीढ़ियाँ चढ़ने में उन्हें बहुत तकलीफ़ होती थी।

जासूस कबीर

कबीर ने झट से टीवी बंद किया और दौड़कर बोला, “दादी, आप बैठो, मैं ढूँढता हूँ। मैं जासूस कबीर हूँ!” उसने एक पुरानी टॉर्च ली और जासूस की तरह सोफ़े के नीचे, मेज़ के पीछे, पूजा घर में — सब जगह देखा। चश्मा कहीं नहीं था।

थककर वह दादी के पास आया और उनके सामने खड़ा हुआ। तभी उसकी आँखें गोल हो गईं और वह ज़ोर से हँस पड़ा। “दादी! चश्मा तो आपके सिर पर है!” दादी ने सिर पर हाथ रखा, और सच में चश्मा वहीं था! दोनों इतना हँसे कि दादी की आँखों से आँसू आ गए।

दादी ने कबीर को गोद में बिठाया और कहा, “तुमने अपना कार्टून छोड़कर मेरी मदद की, यह मुझे बहुत अच्छा लगा। चलो, इसके इनाम में आज मैं तुम्हें हनुमान जी की सबसे मज़ेदार कहानी सुनाती हूँ।” उस शाम कबीर को लगा कि दादी की कहानी किसी भी कार्टून से कहीं ज़्यादा अच्छी थी।

कहानी की सीख

बड़ों की मदद बिना कहे करो। अपने मज़े को थोड़ी देर रोककर किसी अपने की मदद करने से जो खुशी मिलती है, वह सबसे बड़ी होती है।

14

बारिश में भीगा पिल्ला

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

सावन का महीना था। स्कूल से लौटते हुए अचानक ज़ोरदार बारिश शुरू हो गई। अनाया अपनी मम्मी का हाथ पकड़कर तेज़ी से चल रही थी कि उसे एक धीमी-सी “कूँ-कूँ” की आवाज़ सुनाई दी। नाली के पास, एक टूटे डिब्बे के अंदर, एक छोटा-सा भूरा पिल्ला काँप रहा था। उसके एक पैर में चोट लगी थी और वह उसे ज़मीन पर नहीं रख पा रहा था।

अनाया का मन हुआ कि दौड़कर उसे उठा ले। पर उसे याद आया कि मम्मी ने कहा था — अनजान जानवरों को अकेले कभी मत छूना, क्योंकि डर में वे काट भी सकते हैं। उसने मम्मी का हाथ खींचा, “मम्मी, देखो! इसका पैर टूट गया है। हम इसकी मदद कर सकते हैं?”

मम्मी का दुपट्टा

मम्मी ने ध्यान से देखा। पिल्ला बहुत कमज़ोर था और आस-पास उसकी माँ भी नहीं दिख रही थी। मम्मी ने अपना दुपट्टा उतारा, धीरे से पिल्ले को उसमें लपेटा और गोद में उठा लिया। घर आकर उन्होंने उसे सूखे तौलिये से पोंछा और अनाया ने एक कटोरी में गुनगुना दूध रखा। पिल्ला सारा दूध पी गया!

शाम को पापा उसे जानवरों के डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने पैर पर पट्टी बाँधी और कहा, “अच्छा हुआ जो आप समय पर ले आए। हफ़्ते भर में यह दौड़ने लगेगा।” अनाया ने उसका नाम रखा — “बादल”, क्योंकि वह बारिश वाले दिन मिला था।

सच में एक हफ़्ते में बादल उछल-कूद करने लगा। पापा ने सोसायटी के गार्ड अंकल से बात की, और अब बादल गेट के पास अपने छोटे-से घर में रहता है। हर शाम जब अनाया स्कूल से लौटती है, बादल दौड़कर आता है और इतनी ज़ोर से पूँछ हिलाता है कि उसका पूरा शरीर हिलने लगता है।

कहानी की सीख

जानवरों पर दया करो, और मुश्किल या ख़तरे वाले काम में हमेशा किसी बड़े की मदद लो। जो प्यार हम देते हैं, वह कई गुना होकर लौटता है।

15

बिखरी हुई किताबें

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

स्कूल की घंटी बजी और सारे बच्चे सीढ़ियों से नीचे दौड़ने लगे। रोहन का बस्ता पुराना था और उसकी ज़िप अक्सर खुल जाती थी। उस दिन भीड़ में किसी का धक्का लगा, ज़िप खुल गई और उसकी सारी किताबें, कॉपियाँ, पेंसिलें और टिफ़िन सीढ़ियों पर बिखर गए। टिफ़िन का ढक्कन खुला और पोहा भी फैल गया।

कुछ बच्चे रुककर हँसने लगे। एक ने कहा, “हा-हा, रोहन का सामान सीढ़ियों पर पिकनिक मना रहा है!” रोहन का चेहरा लाल हो गया। वह घुटनों के बल बैठकर जल्दी-जल्दी सामान समेटने लगा, पर उसके हाथ काँप रहे थे और आँखों में आँसू आने को थे।

मीरा भी उसी भीड़ में थी। उसे याद आया कि एक बार स्टेज पर उसका दुपट्टा उलझ गया था और सब हँसे थे — उस दिन उसे कितना बुरा लगा था। वह भीड़ से निकलकर रोहन के पास बैठ गई और बिना कुछ कहे उसकी किताबें उठाने लगी। उसने अपने बस्ते से एक रुमाल निकालकर पोहा भी साफ़ किया।

मीरा को देखकर उसके दोस्त करण और नेहा भी आ गए। करण ने अपने बस्ते से एक रबर बैंड निकाला और रोहन के बस्ते की ज़िप के पास बाँध दिया, “अब यह नहीं खुलेगी!” दो मिनट में सारा सामान वापस बस्ते में था। रोहन ने धीरे से कहा, “धन्यवाद… मुझे लगा सब मेरा मज़ाक ही उड़ाएँगे।”

जो बच्चे हँस रहे थे, वे अब चुप खड़े थे। उनमें से एक आगे आया और बोला, “सॉरी रोहन, हमें हँसना नहीं चाहिए था।” अगले दिन से रोहन, मीरा, करण और नेहा साथ मिलकर सीढ़ियाँ उतरते थे — धीरे-धीरे, एक-दूसरे का ध्यान रखते हुए।

कहानी की सीख

किसी की परेशानी पर हँसो मत, उसकी मदद करो। एक अच्छा काम दूसरों को भी अच्छा बनने की हिम्मत देता है।

16

एक छाता, दो लोग

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

विहान को उसके जन्मदिन पर एक नया लाल छाता मिला था, जिस पर पीले रंग के मेंढक बने थे। वह रोज़ आसमान की तरफ़ देखता कि कब बारिश हो और वह अपना छाता खोले। आखिरकार एक शाम, जब वह पापा के साथ बाज़ार से लौट रहा था, काले बादल घिर आए और झमाझम बारिश शुरू हो गई। विहान ने शान से अपना छाता खोला।

रास्ते में मोड़ पर सब्ज़ी वाली कमला अम्मा बैठती थीं। वे रोज़ विहान को एक टमाटर या गाजर मुफ़्त में देती थीं और कहतीं, “खा ले, ताक़त आएगी।” आज वे बारिश में भीग रही थीं और एक पुरानी पन्नी से अपनी सब्ज़ियों को ढकने की कोशिश कर रही थीं। पन्नी बार-बार हवा से उड़ जाती थी।

विहान का फ़ैसला

विहान रुक गया। उसने अपने नए छाते को देखा, फिर अम्मा को। उसका मन थोड़ा-सा चाहता था कि छाता उसके पास ही रहे। पर उसने सोचा, “मैं तो दस मिनट में घर पहुँच जाऊँगा, पर अम्मा को तो रात तक यहीं बैठना है।” उसने पापा की तरफ़ देखा, “पापा, क्या मैं अपना छाता अम्मा को दे दूँ? हम आपके छाते में चलेंगे।” पापा ने मुस्कुराकर हाँ कहा।

विहान ने अपना लाल छाता अम्मा की टोकरी के ऊपर टिका दिया। अम्मा की आँखें नम हो गईं, “अरे बेटा, तेरा नया छाता है…” विहान बोला, “कल लौटा देना, अम्मा।” फिर वह और पापा एक ही छाते में सिमटकर घर की ओर चल पड़े। दोनों के कंधे भीग गए, पर विहान पूरे रास्ते गुनगुनाता रहा।

अगले दिन सुबह दरवाज़े की घंटी बजी। कमला अम्मा थीं — एक हाथ में विहान का छाता, साफ़-सुथरा और सूखा हुआ, और दूसरे हाथ में अपने गाँव से आए दो बड़े मीठे आम। “कल तूने मेरी सारी सब्ज़ी बचा ली, बेटा। मेरा पूरा दिन ख़राब होने से बच गया।” विहान ने आम खाए तो उसे लगा कि इतने मीठे आम उसने पहले कभी नहीं खाए।

कहानी की सीख

जो हमारे पास है, उसे ज़रूरतमंद के साथ बाँटने से उसका दिन अच्छा हो जाता है — और हमारा दिल भी।

17

चींटियों की कतार

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

गोलू आँगन में अपनी खिलौना कार चला रहा था। अचानक उसने देखा कि दीवार के किनारे-किनारे काली चींटियों की एक लंबी कतार चली जा रही है। उसने सोचा, “ये तो मेरी कार के रास्ते में आ रही हैं!” और उन्हें मसलने के लिए पैर उठाया।

तभी बरामदे में बैठी दादी ने आवाज़ दी, “गोलू, रुको! पहले देखो तो सही, ये क्या कर रही हैं।” गोलू ने पैर नीचे रखा और झुककर ध्यान से देखा। हर चींटी के मुँह में कुछ सफ़ेद था — किसी के पास चावल का दाना, किसी के पास रोटी का टुकड़ा। कुछ चींटियाँ तो अपने से दोगुना बड़ा टुकड़ा उठाकर चल रही थीं!

दादी ने उसे पास बुलाया, “पता है, ये सारी सर्दियों के लिए खाना जमा कर रही हैं। ज़मीन के अंदर इनका पूरा घर है — उसमें इनके बच्चे हैं, इनकी रानी है। जैसे तुम्हारे पापा काम से लौटते हुए तुम्हारे लिए कुछ लाते हैं, वैसे ही ये अपने परिवार के लिए खाना ले जा रही हैं।”

गोलू को बड़ा अचरज हुआ। “इतनी छोटी होकर भी इतनी मेहनत?” उसे अपने उठाए हुए पैर पर शर्म आई। उसने अपनी कार दूसरी तरफ़ कर ली और रसोई से एक चुटकी चीनी लाकर कतार से थोड़ी दूर रख दी। कुछ ही देर में चींटियाँ उस चीनी तक पहुँच गईं और एक-एक दाना उठाने लगीं।

उस दिन गोलू घंटे भर चींटियों को देखता रहा। उसने देखा कि जब एक चींटी से दाना गिर जाता, तो दूसरी आकर मदद करती। रात को खाने पर उसने पापा को पूरी कहानी सुनाई और कहा, “पापा, चींटियाँ कितनी समझदार होती हैं! अब मैं किसी को नहीं मारूँगा।”

कहानी की सीख

छोटे से छोटा जीव भी मायने रखता है। किसी को बेवजह नुकसान मत पहुँचाओ, पहले उसे समझने की कोशिश करो।

18

पट्टी वाला हीरो

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

प्रिया के पास एक नीला रोबोट था, जो उसके मामा ने विदेश से भेजा था। बटन दबाने पर उसकी आँखें चमकतीं और वह हाथ हिलाकर “हैलो!” बोलता। प्रिया उसे सबसे संभालकर रखती थी और किसी को छूने नहीं देती थी — ख़ासकर अपने तीन साल के छोटे भाई अयान को।

एक दिन प्रिया नहा रही थी। अयान ने देखा कि रोबोट मेज़ पर रखा है। वह बस एक बार उसे “हैलो” कहते हुए देखना चाहता था। उसने पंजों के बल खड़े होकर रोबोट को खींचा — और “धड़ाम!” रोबोट ज़मीन पर गिरा और उसका एक हाथ टूटकर अलग हो गया।

प्रिया आवाज़ सुनकर दौड़ती हुई आई। टूटा हाथ देखकर उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह चिल्लाने ही वाली थी, “तूने मेरा रोबोट…” कि उसने देखा — अयान कोने में सिकुड़ा बैठा था, दोनों हाथों से आँखें ढके, सिसकियाँ लेता हुआ। “सॉरी दीदी… मैं बस हैलो सुनना चाहता था…”

प्रिया के मन में गुस्सा और प्यार दोनों एक साथ थे। उसने आँखें बंद कीं और तीन गहरी साँसें लीं, जैसा मम्मी ने सिखाया था। फिर वह अयान के पास बैठी और बोली, “कोई बात नहीं, तूने जानबूझकर नहीं किया। पर अगली बार मुझसे पूछ लेना, मैं खुद दिखा दूँगी।” अयान ने उसे कसकर गले लगा लिया।

शाम को पापा के साथ दोनों ने मिलकर गोंद से रोबोट का हाथ जोड़ा और ऊपर से एक सफ़ेद पट्टी बाँध दी। अयान ने कहा, “अब यह घायल हीरो है!” उस दिन से रोबोट का नाम पड़ गया — “पट्टी वाला हीरो”। और अब प्रिया हर रविवार अयान के साथ मिलकर उससे खेलती है।

कहानी की सीख

माफ़ करना गुस्से से बड़ी ताक़त है। गुस्सा आए तो पहले गहरी साँस लो, फिर बोलो।

19

तन्वी के लिए कार्ड

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

सारा और तन्वी पक्की सहेलियाँ थीं। दोनों एक ही बेंच पर बैठतीं, एक ही टिफ़िन से खातीं, और छुट्टी के बाद एक ही वैन में घर जातीं। पर इस हफ़्ते तन्वी स्कूल नहीं आ रही थी। टीचर ने बताया कि उसे तेज़ बुखार है और डॉक्टर ने पूरा हफ़्ता आराम करने को कहा है।

स्कूल में सारा का मन बिल्कुल नहीं लग रहा था। लंच में वह अकेले खाती और वैन में खिड़की से बाहर देखती रहती। घर आकर उसने मम्मी से कहा, “मम्मी, तन्वी को भी घर पर अकेले बहुत बुरा लग रहा होगा। क्या मैं उसके लिए कुछ कर सकती हूँ?” मम्मी ने कहा, “तुम सोचो, तुम्हें क्या अच्छा लगता अगर तुम बीमार होतीं?”

पीले सूरज वाला कार्ड

सारा ने सोचा और फिर काम में जुट गई। उसने पीले काग़ज़ पर एक बड़ा सा सूरज बनाया और लिखा — “जल्दी ठीक हो जाओ, तन्वी! तुम्हारे बिना बेंच खाली है।” उसने कार्ड पर सितारे चिपकाए और दोनों की एक छोटी-सी तस्वीर भी बनाई। फिर उसने क्लास में जो पढ़ाया गया था, वह साफ़-साफ़ एक कॉपी में लिखा ताकि तन्वी पीछे न रह जाए।

शाम को वह मम्मी के साथ तन्वी के घर गई। तन्वी बिस्तर पर लेटी थी, कमज़ोर और उदास। पर जैसे ही उसने कार्ड देखा, उसका चेहरा खिल उठा। उसने कार्ड अपने तकिए के पास रखा और बोली, “अब मैं जल्दी ठीक हो जाऊँगी, क्योंकि मेरे पास सूरज है!” तन्वी की मम्मी ने कहा कि हफ़्ते भर में पहली बार वह इतना हँसी है।

तीन दिन बाद तन्वी स्कूल लौटी। सारा की कॉपी की वजह से उसे क्लास में कुछ भी नया नहीं लगा। और सारा का बनाया सूरज अब तन्वी के कमरे की दीवार पर टंगा है।

कहानी की सीख

सच्चे दोस्त मुश्किल समय में साथ देते हैं। किसी का दिल खुश करने के लिए बड़े तोहफ़े नहीं, सच्चा प्यार और थोड़ी-सी मेहनत काफ़ी है।

20

सूखा पौधा

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दया और मदद

स्कूल के गलियारे के कोने में मिट्टी का एक पुराना गमला रखा था। उसमें एक गेंदे का पौधा था, पर उसकी पत्तियाँ पीली हो चुकी थीं और तना झुक गया था। सैकड़ों बच्चे रोज़ उसके पास से गुज़रते, पर किसी का ध्यान उस पर नहीं जाता।

एक दिन कृष की पानी की बोतल लुढ़ककर उसी गमले के पास जा गिरी। उसे उठाते हुए कृष ने पौधे को ध्यान से देखा। उसकी मिट्टी पत्थर जैसी सख़्त हो चुकी थी। पर एक टहनी पर, बिल्कुल ऊपर, एक छोटी-सी हरी कली अभी भी बची थी। कृष को लगा जैसे पौधा कह रहा हो, “मैं अभी हारा नहीं हूँ।”

कृष ने अपनी बोतल से थोड़ा पानी गमले में डाला। उसने ठान लिया कि हर सुबह प्रार्थना के बाद वह यही करेगा। उसके दोस्तों ने पहले तो कहा, “यह तो मर चुका है, क्यों मेहनत कर रहे हो?” पर कृष ने उन्हें वह हरी कली दिखाई। अगले दिन नेहा भी बोतल लेकर आई, फिर कबीर, फिर और बच्चे। किसी ने घर से थोड़ी खाद लाकर डाली, तो किसी ने गमले को धूप वाली जगह पर खिसका दिया।

दिन बीतते गए। पहले तना सीधा हुआ, फिर नई हरी पत्तियाँ आईं। और एक सुबह, ठीक एक महीने बाद, वही कली खिलकर एक बड़ा सा नारंगी गेंदा बन गई। बच्चों ने इतना शोर मचाया कि प्रिंसिपल मैडम खुद देखने आ गईं। उन्होंने प्रार्थना सभा में कृष और उसके दोस्तों के लिए तालियाँ बजवाईं और स्कूल में “हरियाली क्लब” शुरू किया, जिसका पहला कप्तान बना — कृष।

कहानी की सीख

थोड़ी-सी देखभाल रोज़ करो, तो बड़ा बदलाव आता है। जिसे सब भूल जाएँ, उसका ध्यान रखना सबसे सुंदर दया है।

मेहनत और हिम्मत की नैतिक कहानियाँ

21

गिरती-संभलती साइकिल

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

दिव्या के छठे जन्मदिन पर पापा उसके लिए एक गुलाबी साइकिल लाए, जिसके हैंडल पर रंग-बिरंगे रिबन लगे थे और आगे एक छोटी टोकरी। पर इस साइकिल में पीछे के छोटे पहिए नहीं थे। पापा ने कहा, “अब तुम बड़ी हो गई हो, अब असली साइकिल सीखोगी।”

पहले दिन दिव्या ने पैडल पर पैर रखा और साइकिल सीधे एक तरफ़ लुढ़क गई। धड़ाम! उसका घुटना छिल गया। दूसरे दिन वह थोड़ा आगे गई, पर सामने आते कुत्ते को देखकर घबरा गई और झाड़ियों में जा गिरी। तीसरे दिन उसने साइकिल को देखा और मुँह फुलाकर बोली, “मुझसे नहीं होगा। यह साइकिल मुझे पसंद ही नहीं करती!”

दादा जी बरामदे में बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। उन्होंने दिव्या को पास बुलाया, “पता है, जब तुम छोटी थीं और चलना सीख रही थीं, तो तुम सौ बार गिरी थीं। हर बार रोती थीं, पर फिर खड़ी हो जाती थीं। अगर तुम तब हार मान लेतीं, तो आज दौड़ कैसे पातीं?” दिव्या हँस पड़ी। दादा जी ने एक राज़ भी बताया, “नीचे पहिए को मत देखो, सामने देखो कि कहाँ जाना है।”

फिर से कोशिश

अगले दिन दिव्या ने घुटनों पर पैड बाँधे, हेलमेट पहना और फिर से कोशिश की। पापा ने पीछे से सीट पकड़ी और साथ में दौड़ने लगे। “सामने देखो… पैडल चलाते रहो… शाबाश!” दिव्या ने काफ़ी दूर तक साइकिल चलाई और पीछे मुड़कर बोली, “पापा, छोड़ना मत!” पर पापा तो बहुत पीछे खड़े तालियाँ बजा रहे थे! वे कब का छोड़ चुके थे — दिव्या खुद चला रही थी!

उस शाम दिव्या ने पूरी कॉलोनी के तीन चक्कर लगाए और हर बार दादा जी के सामने से घंटी बजाते हुए गुज़री। उसके घुटने पर अभी भी हल्का-सा निशान था, पर अब वह उसे देखकर मुस्कुराती थी — वह उसकी हिम्मत का मैडल था।

कहानी की सीख

गिरना सीखने का हिस्सा है। जो गिरकर फिर से उठता है, वही आगे बढ़ता है।

22

अँधेरे का राक्षस

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

कबीर को दिन में किसी चीज़ से डर नहीं लगता था। वह पेड़ पर चढ़ जाता, कुत्तों से खेलता, और स्कूल में सबसे तेज़ दौड़ता। पर रात होते ही उसकी सारी हिम्मत गायब हो जाती। जैसे ही मम्मी लाइट बंद करतीं, उसे लगता कि कमरे के कोने में कोई बड़ा-सा राक्षस खड़ा है, जिसके लंबे हाथ और फूला हुआ सिर है।

हर रात वह चादर से पूरा सिर ढक लेता और साँस रोककर लेटा रहता। कभी-कभी तो वह आधी रात को उठकर मम्मी-पापा के बिस्तर में घुस जाता। उसे शर्म भी आती, क्योंकि उसका छोटा भाई भी अकेले सो जाता था।

एक रात पापा उसके पास आए और बोले, “कबीर, अगर कमरे में राक्षस है, तो चलो उससे मिलते हैं। हम दोनों मिलकर उसका सामना करेंगे।” उन्होंने कबीर के हाथ में एक टॉर्च दी। कबीर का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, पर पापा का हाथ पकड़कर उसने काँपते हाथों से टॉर्च की रोशनी कोने पर डाली।

राक्षस का राज़ खुला

वहाँ राक्षस नहीं था। कुर्सी पर पापा का कोट टंगा था, और उसके ऊपर कबीर की क्रिकेट की गोल टोपी रखी थी। कोट की बाँहें नीचे लटक रही थीं — वही थे “लंबे हाथ”। कबीर पहले तो हैरान हुआ, फिर इतने ज़ोर से हँसा कि मम्मी भी दौड़ती हुई आ गईं। “मेरा राक्षस तो आपका कोट है, पापा!”

पापा ने कहा, “डर अक्सर ऐसा ही होता है — अँधेरे में बहुत बड़ा दिखता है, पर जब हम हिम्मत की रोशनी डालते हैं, तो वह छोटा हो जाता है।” उस रात कबीर ने टॉर्च अपने तकिए के पास रखी और कोट को खुद अलमारी में टाँग दिया। वह पहली बार अपने बिस्तर पर पूरी रात अकेले सोया — और सुबह उठकर सबसे पहले अपने छोटे भाई को यह कारनामा सुनाया।

कहानी की सीख

डर से भागो मत, उसका सामना करो। जिस चीज़ से हम डरते हैं, उसे समझ लें तो डर अक्सर गायब हो जाता है।

23

आम की गुठली

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

गर्मियों की छुट्टियाँ थीं और आरव अपने नाना जी के गाँव आया था। नाना जी के आँगन में एक विशाल आम का पेड़ था, जिस पर सैकड़ों पीले-सुनहरे आम लटक रहे थे। एक दिन आम खाते हुए आरव ने पूछा, “नाना जी, मैं भी ऐसा पेड़ लगाना चाहता हूँ। कैसे लगाऊँ?”

नाना जी ने उसके हाथ की गुठली की तरफ़ इशारा किया, “यही है तुम्हारा पेड़।” दोनों ने मिलकर आँगन के कोने में गड्ढा खोदा, गुठली दबाई और पानी डाला। अगली सुबह आरव सबसे पहले उठकर दौड़ा — पर वहाँ सिर्फ़ मिट्टी थी। दूसरे दिन भी मिट्टी, तीसरे दिन भी। आरव ने मुँह बनाया, “नाना जी, मेरा पेड़ तो आ ही नहीं रहा!”

नाना जी हँसे, “बेटा, अच्छी चीज़ें धीरे-धीरे बढ़ती हैं। गुठली अंदर ही अंदर जड़ें बना रही है, जो हमें दिखती नहीं। तुम्हारा काम है रोज़ पानी देना और भरोसा रखना।” आरव ने रोज़ पानी दिया। दसवें दिन मिट्टी को चीरती हुई दो छोटी-छोटी लाल पत्तियाँ निकलीं! आरव खुशी से नाचने लगा।

छुट्टियाँ खत्म हुईं तो नाना जी ने वादा किया कि वे पौधे का ध्यान रखेंगे। हर साल आरव गाँव आता और अपने पेड़ के साथ फ़ोटो खिंचवाता। पहले साल पेड़ उसके घुटने तक था, फिर कमर तक, फिर सिर तक। और जिस साल आरव सातवीं क्लास में पहुँचा, उस साल उस पेड़ पर पहली बार आम आए — पूरे बारह आम!

आरव ने पहला आम तोड़कर नाना जी को दिया। नाना जी ने एक टुकड़ा खाया और बोले, “यह दुनिया का सबसे मीठा आम है, क्योंकि इसमें तुम्हारा सब्र घुला है।”

कहानी की सीख

बड़ी चीज़ें एक दिन में नहीं बनतीं। रोज़ थोड़ी मेहनत और ढेर सारा धैर्य रखो, फल ज़रूर मिलता है।

24

मीरा की कविता

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

स्कूल का वार्षिक उत्सव आने वाला था। टीचर ने मीरा को एक कविता सुनाने के लिए चुना, क्योंकि उसकी आवाज़ बहुत मीठी थी। मीरा पहले तो खुश हुई, पर जब उसने सोचा कि सैकड़ों लोगों के सामने माइक पर खड़े होना है, तो उसके पेट में तितलियाँ उड़ने लगीं।

घर आकर उसने मम्मी से कहा, “मैं टीचर से मना कर दूँगी। अगर मैं भूल गई तो? सब हँसेंगे।” मम्मी ने कहा, “डर लगना ठीक है, बेटा। हिम्मत का मतलब डर न लगना नहीं, डर के साथ भी काम करना है। चलो, हम अभ्यास करते हैं।”

उस दिन से मीरा ने रोज़ अभ्यास किया। पहले शीशे के सामने, फिर अपने टेडी बियर और गुड़ियों के सामने, फिर दादी के सामने, और आख़िर में पड़ोस के सारे बच्चों के सामने। हर बार थोड़ा कम डर लगा। मम्मी ने एक टिप भी दी, “अगर भूल जाओ, तो एक गहरी साँस लेना और मुस्कुरा देना। शब्द खुद लौट आएँगे।”

स्टेज पर मीरा

उत्सव का दिन आया। मीरा स्टेज पर गई। सामने रोशनी थी और ढेर सारे चेहरे। उसने पहली दो पंक्तियाँ बहुत अच्छे से बोलीं, पर तीसरी पंक्ति पर उसका दिमाग़ बिल्कुल खाली हो गया। हॉल में सन्नाटा था। उसका दिल ज़ोर से धड़का। तभी उसे मम्मी की बात याद आई। उसने गहरी साँस ली, दर्शकों में बैठी मम्मी को देखा, और मुस्कुरा दी — और सच में, अगली पंक्ति खुद लौट आई!

उसने पूरी कविता सुनाई। जैसे ही वह रुकी, पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। स्टेज से उतरकर वह दौड़कर मम्मी के पास गई, “मम्मी, मैं बीच में भूल गई थी!” मम्मी ने उसे गले लगाया, “हाँ, और फिर भी तुमने हार नहीं मानी। यही तो सबसे बड़ी बात है।”

कहानी की सीख

हिम्मत का मतलब डर न लगना नहीं है, डर के बावजूद कुछ करना है। अभ्यास से डर छोटा होता जाता है।

25

पहाड़ की चोटी

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

पूरा परिवार छुट्टियों में पहाड़ों पर घूमने गया था। होटल के पीछे एक छोटी पहाड़ी थी, जिसकी चोटी पर एक सुंदर पुराना मंदिर था। पापा ने कहा, “कल सुबह हम सब चोटी तक चढ़ेंगे और वहाँ से सूरज उगता हुआ देखेंगे।” विहान खुशी से उछल पड़ा।

सुबह सब निकल पड़े। पहले तो विहान सबसे आगे दौड़ता रहा। पर थोड़ी ही देर में उसकी साँस फूलने लगी और पैर भारी हो गए। उसने ऊपर देखा — चोटी अभी भी बहुत दूर थी। वह एक पत्थर पर बैठ गया, “मुझसे नहीं होगा। इतना ऊँचा कोई कैसे चढ़ सकता है? मैं यहीं इंतज़ार करूँगा।”

मम्मी उसके पास बैठीं और उसे पानी पिलाया। फिर बोलीं, “चोटी को मत देखो। बस अगले पेड़ तक चलना है। वह देखो, लाल फूलों वाला पेड़। वहाँ पहुँचकर हम एक टॉफ़ी खाएँगे।” विहान उठा और लाल फूलों वाले पेड़ तक पहुँच गया। फिर मम्मी ने कहा, “अब उस बड़े पत्थर तक, जो हाथी जैसा दिखता है।” फिर उस झरने तक, फिर उस मोड़ तक।

हर छोटे निशान तक पहुँचकर विहान को नई ताक़त मिलती। और फिर, पता ही नहीं चला कब, वह मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ा था! ठीक उसी समय पहाड़ों के पीछे से नारंगी सूरज धीरे-धीरे उगने लगा। पूरा आसमान सुनहरा हो गया।

विहान ने नीचे देखा — होटल एक खिलौने जैसा छोटा लग रहा था। वह बोला, “मम्मी, मैंने पूरा पहाड़ नहीं चढ़ा। मैंने बस ढेर सारे छोटे-छोटे कदम चले!” मम्मी ने हँसकर कहा, “हाँ, और सारे बड़े काम ऐसे ही होते हैं।”

कहानी की सीख

कोई भी बड़ा काम डरावना लगे, तो उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट लो। एक-एक कदम चलकर ही चोटी तक पहुँचा जाता है।

26

पानी से दोस्ती

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

ज़ोया के सारे दोस्त गर्मियों में स्विमिंग क्लास जाते थे। वे रोज़ आकर बताते कि आज उन्होंने मछली की तरह तैरकर दिखाया, आज पानी में उछलकर कूदे। ज़ोया का भी मन करता था, पर उसे पानी से बहुत डर लगता था। एक बार बचपन में उसकी नाक में पानी चला गया था, और तब से वह पूल के पास भी नहीं जाती थी।

मम्मी ने उसका नाम क्लास में लिखवा दिया। पहले दिन ज़ोया सिर्फ़ सीढ़ी पर बैठी रही और पैर पानी में डाले रही। कोच दीदी ने उसे ज़बरदस्ती नहीं की। वे बोलीं, “आज तुम्हारा काम सिर्फ़ पानी से नमस्ते करना है।” दूसरे दिन ज़ोया कमर तक पानी में उतरी और किनारा कसकर पकड़े रही। तीसरे दिन कोच दीदी ने सिखाया कि पानी में मुँह डालकर बुलबुले कैसे बनाते हैं — और ज़ोया हँस पड़ी, क्योंकि बुलबुले उसके कानों में गुदगुदी कर रहे थे।

सबसे मुश्किल दिन

फिर आया सबसे मुश्किल दिन — पानी पर लेटना। कोच दीदी ने कहा, “पीठ के बल लेट जाओ, मैंने तुम्हें पकड़ा हुआ है।” ज़ोया के हाथ-पैर काँप रहे थे। वह बार-बार खड़ी हो जाती। सात बार कोशिश की, सातों बार डर गई। घर आकर वह रोई, “मैं कभी नहीं सीख पाऊँगी!” मम्मी ने कहा, “तीन हफ़्ते पहले तुम पूल के पास भी नहीं जाती थीं। आज तुम पानी में बुलबुले बना रही हो। देखो, तुम कितना आगे आ गई हो।”

अगले दिन ज़ोया ने आँखें बंद कीं, गहरी साँस ली और धीरे से पीठ के बल लेट गई। उसने आसमान की तरफ़ देखा — सफ़ेद बादल धीरे-धीरे तैर रहे थे, ठीक उसकी तरह। कुछ पल बाद कोच दीदी ने कहा, “ज़ोया, मैंने तुम्हें छोड़ दिया है।” ज़ोया अकेले पानी पर तैर रही थी! उसके सारे दोस्तों ने किनारे से तालियाँ बजाईं।

गर्मियों के आख़िर तक ज़ोया पूल के एक किनारे से दूसरे किनारे तक तैरने लगी। अब जब कोई नया बच्चा सीढ़ी पर डरा हुआ बैठा होता, तो ज़ोया उसके पास जाकर कहती, “मुझे भी डर लगता था। चलो, पहले पानी से नमस्ते करते हैं।”

कहानी की सीख

डर एक दिन में नहीं जाता, थोड़ा-थोड़ा करके जाता है। हर छोटी जीत को गिनो, और कोशिश करते रहो।

27

फटी हुई पतंग

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

मकर संक्रांति के दिन कॉलोनी में पतंग उड़ाने का मुकाबला होना था। रेहान ने पूरे हफ़्ते अपने दादा जी के साथ मिलकर एक ख़ास पतंग बनाई थी — लाल और पीले रंग की, जिस पर एक सूरज बना था। वह हर रात सोने से पहले उसे देखता और सोचता कि यह सबसे ऊँची उड़ेगी।

मुकाबले की सुबह जैसे ही रेहान छत पर पहुँचा, एक तेज़ हवा का झोंका आया। पतंग उसके हाथ से छूटकर टीवी एंटीना में जा फँसी और “र्रर्र” की आवाज़ के साथ बीच से फट गई। रेहान की आँखों में आँसू आ गए। मुकाबला शुरू होने में सिर्फ़ एक घंटा बाक़ी था। उसने कहा, “अब कुछ नहीं हो सकता। मैं नहीं खेलूँगा।”

दादा जी ने फटी पतंग हाथ में ली और ध्यान से देखा। “काग़ज़ फटा है, पर तीलियाँ सही-सलामत हैं। जिसकी हड्डियाँ मज़बूत हों, वह फिर से खड़ा हो सकता है। हार मानने से पहले कोशिश तो करें?” रेहान ने आँसू पोंछे। दादा जी ने अलमारी से पुराना रंगीन काग़ज़, गोंद और कैंची निकाली।

दोनों ने मिलकर फटे हिस्से पर एक नीला टुकड़ा चिपकाया। अब सूरज के पास एक नीला बादल भी था! पतंग पहले से थोड़ी अलग दिख रही थी, पर कहीं ज़्यादा अनोखी। रेहान ठीक समय पर मैदान पहुँचा।

मुकाबले में उसकी पतंग खूब ऊँची उड़ी। वह पहले नंबर पर तो नहीं आया, दूसरे नंबर पर आया। पर जज अंकल ने उसे एक ख़ास इनाम भी दिया — “सबसे हिम्मती पतंग”। उन्होंने कहा, “हमने देखा कि यह पतंग फटकर भी उड़ी। और इसे उड़ाने वाला बच्चा हारकर भी नहीं हारा।” रेहान ने वह पतंग आज भी अपने कमरे की दीवार पर टाँग रखी है।

कहानी की सीख

मुश्किल आए तो हार मत मानो। जो टूटा है उसे जोड़ो, और फिर से उड़ने की कोशिश करो।

28

बिंदु मधुमक्खी

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

एक बड़े से बगीचे में नीम के पेड़ पर मधुमक्खियों का एक छत्ता था। उसमें हज़ारों मधुमक्खियाँ रहती थीं, और उनमें सबसे छोटी थी बिंदु। हर सुबह सारी मधुमक्खियाँ फूलों से रस लेने जातीं और शाम को लौटकर शहद बनातीं।

बिंदु भी रोज़ उड़ती, पर उसके छोटे पंख जल्दी थक जाते और वह दिन भर में बस थोड़ा-सा रस ही ला पाती। एक दिन वह उदास होकर छत्ते के कोने में बैठ गई। “मैं इतना कम रस लाती हूँ कि मेरे होने न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। कल से मैं काम पर नहीं जाऊँगी।”

रानी मधुमक्खी ने यह सुन लिया। वे बिंदु को छत्ते के सबसे भीतरी हिस्से में ले गईं, जहाँ सुनहरा शहद चमक रहा था। “बिंदु, यह शहद किसी एक मधुमक्खी ने नहीं बनाया। इसकी हर बूँद हज़ारों छोटी-छोटी यात्राओं से बनी है। अगर हर कोई सोचे कि उसका हिस्सा छोटा है, तो यहाँ एक बूँद भी न होती।”

फिर रानी ने एक छोटे-से खाने की तरफ़ इशारा किया, जिसमें थोड़ा-सा हल्का सुनहरा शहद था। “यह खाना तुम्हारा है, बिंदु। इसे तुमने भरा है। और यह शहद सर्दियों में हमारे नन्हें बच्चों का पेट भरेगा।” बिंदु की आँखें चमक उठीं।

अगली सुबह बिंदु सबसे पहले उड़ी। उसके पंख अभी भी छोटे थे और वह अभी भी थोड़ा ही रस लाती थी। पर अब वह हर यात्रा गुनगुनाते हुए करती, क्योंकि उसे पता था — उसका छोटा-सा हिस्सा भी किसी बड़ी खुशी का हिस्सा है।

कहानी की सीख

कोई भी मेहनत छोटी नहीं होती। जब सब अपना थोड़ा-थोड़ा काम पूरे मन से करते हैं, तभी बड़े काम पूरे होते हैं।

29

आख़िरी नंबर से आगे

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

स्कूल का स्पोर्ट्स डे था। गोलू ने सौ मीटर की दौड़ में नाम लिखाया था। उसने सोचा था कि वह जीतेगा और मेडल पहनेगा। सीटी बजी और सब दौड़ पड़े। गोलू ने पूरा ज़ोर लगाया, पर आधे रास्ते में ही उसकी साँस फूल गई। वह आख़िरी नंबर पर आया।

घर आकर वह अपने कमरे में चुपचाप बैठ गया। मम्मी ने आकर पूछा, तो वह फूट-फूटकर रो पड़ा, “मैं सबसे आख़िर में आया। सब मेरा मज़ाक उड़ाएँगे। मैं अब कभी दौड़ में नाम नहीं लिखाऊँगा।” मम्मी ने उसके आँसू पोंछे और पूछा, “क्या तुमने दौड़ से पहले अभ्यास किया था?” गोलू ने सिर हिलाया — नहीं। मम्मी मुस्कुराईं, “तो आज तुम हारे नहीं, आज तुमने सीखा कि अगली बार क्या करना है।”

उस दिन से गोलू और पापा हर सुबह पार्क में दौड़ने जाने लगे। पहले दिन वह एक चक्कर भी पूरा नहीं कर पाया। एक हफ़्ते बाद एक चक्कर, एक महीने बाद तीन चक्कर। पापा हर हफ़्ते फ़ोन पर उसका समय नोट करते। गोलू को सबसे अच्छा यह लगता था कि उसका समय हर हफ़्ते थोड़ा-सा कम हो जाता था। उसे अपने आप से ही मुकाबला करने में मज़ा आने लगा।

अगले साल फिर स्पोर्ट्स डे आया। इस बार गोलू तीसरे नंबर पर आया। उसे कांसे का मेडल मिला। जब वह मंच पर खड़ा था, तो उसने देखा कि मम्मी-पापा सबसे ज़ोर से तालियाँ बजा रहे हैं। घर आकर उसने मेडल के साथ एक काग़ज़ भी दीवार पर चिपकाया, जिस पर लिखा था — “पिछले साल: आख़िरी। इस साल: तीसरा। अगले साल: देखते हैं!”

कहानी की सीख

हार का मतलब ख़त्म होना नहीं, सीखना है। दूसरों से नहीं, कल वाले खुद से बेहतर बनने की कोशिश करो।

30

हाथ उठाने की हिम्मत

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • मेहनत और हिम्मत

इरा क्लास की सबसे शांत बच्ची थी। वह ध्यान से सुनती, साफ़-साफ़ लिखती, पर कभी कुछ नहीं पूछती। एक दिन टीचर ने घड़ी देखना सिखाया — छोटी सुई, बड़ी सुई, पाँच-पाँच मिनट की गिनती। सब बच्चे सिर हिला रहे थे, पर इरा को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

टीचर ने पूछा, “किसी को कुछ पूछना है?” इरा का हाथ थोड़ा-सा उठा, फिर वापस नीचे आ गया। उसने सोचा, “अगर मैंने पूछा, तो सब सोचेंगे कि मैं बुद्धू हूँ। सबको तो समझ आ गया।” घर पर होमवर्क में घड़ी के सवाल थे। इरा घंटे भर बैठी रही, पर एक भी सवाल नहीं कर पाई। उसे अपने आप पर गुस्सा आने लगा।

रात को दादी ने उसकी उदासी की वजह पूछी। सब सुनकर दादी बोलीं, “बेटा, सवाल पूछना बुद्धूपन नहीं, हिम्मत है। और पता है, जब तुम सवाल पूछती हो, तो अक्सर वे बच्चे भी सीख जाते हैं जो डर के मारे चुप बैठे होते हैं।”

अगले दिन इरा ने गहरी साँस ली और हाथ उठाया, “मैडम, मुझे घड़ी वाला पाठ समझ नहीं आया। क्या आप फिर से समझा सकती हैं?” उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था। पर तभी पीछे से एक और आवाज़ आई, “मैडम, मुझे भी नहीं आया।” फिर एक और, फिर एक और। पूरे आठ बच्चों ने हाथ उठाया!

टीचर ने मुस्कुराकर कहा, “धन्यवाद, इरा। तुम्हारी वजह से आज आठ बच्चे सीख पाएँगे।” इस बार टीचर ने एक बड़ी काग़ज़ की घड़ी बनाकर खेल-खेल में समझाया। उस दिन इरा ने घड़ी देखना भी सीखा, और सबसे बड़ी बात — पूछना भी सीखा।

कहानी की सीख

सवाल पूछना कमज़ोरी नहीं, हिम्मत है। जो समझ न आए, उसे पूछने से कभी मत शर्माओ।

दोस्ती और मिल-जुलकर रहने की नैतिक कहानियाँ

31

बारी-बारी का झूला

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

कॉलोनी के पार्क में एक ही झूला था, और वह सब बच्चों का पसंदीदा था। रोज़ शाम को उस पर बैठने के लिए ख़ूब धक्का-मुक्की होती। उस दिन अर्जुन सबसे पहले पहुँचा और झूले पर बैठ गया। वह ऊँचे और ऊँचे झूलता रहा, और उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था।

धीरे-धीरे लाइन लंबी होती गई। छोटी निधि की आँखों में आँसू आने लगे, क्योंकि उसकी मम्मी का फ़ोन आ गया था कि दस मिनट में घर आना है। सारे बच्चे चिल्लाने लगे, “अर्जुन, उतरो! हमारी भी बारी है!” अर्जुन ने कहा, “मैं पहले आया था, तो जब तक चाहूँ झूलूँगा।”

तभी पार्क के बेंच पर बैठे शर्मा दादा जी उठकर आए। उन्होंने अर्जुन से पूछा, “बेटा, क्या तुम्हें अकेले झूलने में ज़्यादा मज़ा आता है, या दोस्तों के साथ खेलने में?” अर्जुन ने इधर-उधर देखा। सब बच्चे उससे नाराज़ थे और कोई उसके साथ बात नहीं कर रहा था। अचानक झूला उतना मज़ेदार नहीं लगा।

दादा जी ने एक उपाय बताया, “चलो, एक खेल खेलते हैं। हर कोई बीस झोंके लेगा, और बाक़ी सब मिलकर गिनती करेंगे। जिसको जल्दी जाना है, वह पहले जाएगा।” अर्जुन ने थोड़ा सोचा और कूदकर नीचे उतर आया। “निधि, तुम पहले झूलो। मैं तुम्हें धक्का दूँगा!”

सब बच्चों ने एक साथ गिनती शुरू की — “एक! दो! तीन!…” निधि खिलखिलाकर हँस रही थी। हर बच्चे को बारी मिली, और हर बार सब मिलकर गिनते — यह अकेले झूलने से कहीं ज़्यादा मज़ेदार था। उस दिन से पार्क में एक नया नियम बन गया, जिसका नाम बच्चों ने रखा — “अर्जुन वाला नियम”।

कहानी की सीख

बारी-बारी खेलने से सबको मज़ा आता है। खुशी बाँटने से कम नहीं होती, बढ़ती है।

32

बैट की लड़ाई

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

कबीर और निखिल बचपन से दोस्त थे। दोनों हर शाम गली में क्रिकेट खेलते। एक दिन कबीर के पापा उसके लिए नया चमचमाता बैट लाए। खेल के दौरान निखिल ने बैटिंग की और एक ज़ोरदार शॉट मारा — गेंद दीवार से टकराई, और बैट के किनारे पर एक छोटी-सी दरार आ गई।

कबीर गुस्से से चिल्लाया, “तूने मेरा नया बैट तोड़ दिया! तू जानबूझकर इतने ज़ोर से मारता है!” निखिल को भी गुस्सा आ गया, “मैंने जानबूझकर नहीं किया! रख अपना बैट, मैं कभी तेरे साथ नहीं खेलूँगा!” दोनों अपने-अपने घर गुस्से में चले गए।

अगले दिन कबीर अकेले गली में खड़ा रहा। अकेले क्रिकेट कैसे खेले? उसने देखा कि निखिल भी अपनी बालकनी से झाँक रहा था, उदास चेहरा लिए। दो दिन ऐसे ही बीत गए। कबीर को बैट की दरार से ज़्यादा अपने दोस्त की कमी खल रही थी।

कबीर की मम्मी ने कहा, “बैट की दरार टेप से ठीक हो जाएगी। पर दोस्ती की दरार के लिए किसी को पहला कदम उठाना पड़ता है। और पता है, जो पहले सॉरी कहता है, वह कमज़ोर नहीं, सबसे बहादुर होता है।” कबीर ने बैट पर लाल टेप लपेटा और निखिल के घर की घंटी बजाई।

निखिल ने दरवाज़ा खोला। कबीर बोला, “सॉरी यार, मैंने तुझ पर बेवजह चिल्लाया। देख, बैट ठीक हो गया — और अब इस पर लाल धारी भी है!” निखिल ने भी कहा, “मुझे भी सॉरी। मैं अगली बार दीवार की तरफ़ नहीं मारूँगा।” दोनों हँस पड़े और उसी शाम गली में फिर से “हाउज़ैट!” की आवाज़ें गूँजने लगीं।

कहानी की सीख

चीज़ें टूट जाएँ तो जुड़ सकती हैं, पर दोस्त कीमती होते हैं। लड़ाई के बाद पहले सॉरी कहने वाला सबसे बहादुर होता है।

33

रंगों का डिब्बा

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

रिया के पास क्लास में सबसे बड़ा क्रेयॉन का डिब्बा था — पूरे चौसठ रंग! सुनहरा, चाँदी, गुलाबी, हरे के तीन रंग। वह उसे बहुत संभालकर रखती थी और किसी को छूने नहीं देती थी।

एक दिन ड्रॉइंग क्लास में टीचर ने कहा, “आज सब अपना सबसे प्यारा त्योहार बनाएँगे।” रिया के बग़ल में नया लड़का सोहन बैठा था। उसके पास सिर्फ़ एक पेंसिल और तीन टूटे हुए क्रेयॉन थे — लाल, काला और भूरा। वह दिवाली बना रहा था, पर उसके दीये पीले नहीं हो पा रहे थे। वह चुपचाप रिया के डिब्बे को देख रहा था, पर माँगने की हिम्मत नहीं हुई।

रिया ने उसकी नज़र देख ली। उसका पहला ख़याल था, “अगर मैंने दिया और क्रेयॉन टूट गया तो?” पर फिर उसने सोहन की ड्रॉइंग देखी — काले दीये, बिना रोशनी के। उसे लगा कि दिवाली तो रोशनी बाँटने का त्योहार है। उसने डिब्बा दोनों के बीच में रखा और मुस्कुराकर कहा, “लो, सुनहरा वाला भी लगाओ, दीये और चमकेंगे।”

सोहन का चेहरा खिल गया। दोनों ने मिलकर रंग भरे। सोहन ने रिया को सिखाया कि काले क्रेयॉन से रात का आसमान कैसे बनाते हैं, जिससे पटाखे और चमकें। रिया को यह तरीका पता ही नहीं था! जब टीचर ने ड्रॉइंग देखीं, तो दोनों को “सबसे रोशन दिवाली” का स्टार मिला।

उस दिन रिया ने सीखा कि उसके चौसठ रंग तब सबसे सुंदर लगते हैं जब किसी और की तस्वीर में भी चमकते हैं। और सोहन को क्लास में पहला दोस्त मिल गया।

कहानी की सीख

जो हमारे पास ज़्यादा है, उसे बाँटने से दूसरों की दुनिया रंगीन होती है — और बदले में हमें भी कुछ नया सीखने को मिलता है।

34

रेत का किला

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

छुट्टियों में चार परिवार एक साथ गोवा गए थे। समुंदर के किनारे रेत का किला बनाने का मुकाबला हो रहा था। चारों बच्चे — अनाया, करण, पिंकी और रोहन — अलग-अलग किला बनाने बैठ गए। हर कोई चाहता था कि उसका किला सबसे बड़ा हो।

पर अकेले काम बहुत मुश्किल था। अनाया से दीवारें बार-बार गिर जातीं। करण बाल्टी में पानी लाते-लाते थक गया। पिंकी के पास सीपियाँ थीं, पर किला ही नहीं बन पाया। और रोहन का किला एक लहर आकर बहा ले गई। एक घंटे बाद चारों के पास बस रेत के छोटे-छोटे ढेर थे, और चारों के चेहरे उतरे हुए थे।

तभी पिंकी ने कहा, “अगर हम चारों मिलकर एक किला बनाएँ तो? अनाया के हाथ से किनारे अच्छे बनते हैं, करण पानी ला सकता है, मेरे पास सजावट है, और रोहन सबसे तेज़ी से खाई खोद सकता है!” सबने एक-दूसरे को देखा और फिर ज़ोर से हाँ कहा।

अब काम तेज़ी से होने लगा। रोहन ने किले के चारों तरफ़ गहरी खाई खोदी, ताकि लहरें किले तक न पहुँचें। करण ने गीली रेत के लिए पानी लाया। अनाया ने ऊँची मीनारें बनाईं, और पिंकी ने सीपियों और पंखों से उसे सजाया। एक बड़ी लहर आई — पर खाई में ही रुक गई! चारों ने खुशी से चिल्लाकर ताली मारी।

शाम तक उनका किला पूरे किनारे पर सबसे बड़ा और सबसे सुंदर था। घूमने आए लोग उसके साथ फ़ोटो खिंचवा रहे थे। करण ने कहा, “अकेले हम चार छोटे ढेर थे। साथ मिलकर हम एक किला बन गए!”

कहानी की सीख

मिल-जुलकर काम करने से मुश्किल काम आसान हो जाते हैं। हर किसी के पास कोई न कोई ख़ूबी होती है, और साथ आकर ही सबसे बड़ी ताक़त बनती है।

35

कियारा के पहिए

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

कियारा अनाया की क्लास में नई आई थी। वह व्हीलचेयर पर स्कूल आती थी, क्योंकि उसके पैर चल नहीं पाते थे। पहले कुछ दिन बच्चे उसे दूर से देखते रहे। कोई उससे बात नहीं करता था, शायद इसलिए कि किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात करें। खेल के पीरियड में जब सब मैदान में दौड़ते, कियारा किनारे बैठकर देखती रहती।

एक दिन अनाया ने हिम्मत करके उसके पास जाकर पूछा, “तुम्हें क्या खेलना पसंद है?” कियारा की आँखें चमक उठीं, “मुझे पहेलियाँ बुझाना और कैच-कैच खेलना बहुत पसंद है! मैं बॉल बहुत अच्छे से पकड़ती हूँ।” अनाया हैरान रह गई। उसने सोचा था कि कियारा कुछ नहीं खेल सकती।

अनाया ने बाक़ी दोस्तों को बुलाया और सबने कियारा के साथ कैच-कैच खेला। सच में कियारा ने एक भी बॉल नहीं छोड़ी! फिर उसने ऐसी पहेलियाँ पूछीं कि सब सिर खुजाते रह गए — “वह कौन-सी चीज़ है जिसके दाँत हैं पर वह काटती नहीं?” (कंघी!) बच्चे हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।

अगले दिन से खेल के पीरियड में नए खेल शुरू हुए, जिनमें सब शामिल हो सकें। जब दौड़ का खेल होता, तो कियारा सीटी बजाती और जज बनती। अनाया को समझ आया कि कियारा की व्हीलचेयर उसकी कहानी का बस एक हिस्सा थी — पूरी कहानी तो उसकी हँसी, उसकी होशियारी और उसकी दोस्ती में थी।

कहानी की सीख

किसी को उसके अलग होने की वजह से पीछे मत छोड़ो। पूछो, जानो, और साथ में खेलने का तरीका ढूँढो — हर किसी में कुछ ख़ास होता है।

36

नए जूते और हरी आँखें

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

सोमवार को नेहा स्कूल में चमचमाते नए जूते पहनकर आई — सफ़ेद जूते, जिनके तलवों में हर कदम पर रंग-बिरंगी लाइटें जलती थीं। सारे बच्चे उसके आस-पास जमा हो गए। “वाह! फिर से कूदो ना!” नेहा खुशी-खुशी कूद के दिखा रही थी।

नेहा की सबसे पक्की सहेली सान्वी दूर खड़ी थी। उसे अजीब-सा लग रहा था — जैसे पेट में कोई कड़वी चीज़ घूम रही हो। उसके अपने जूते पुराने थे और एक तरफ़ से घिस गए थे। लंच में जब नेहा उसके पास बैठी, तो सान्वी ने मुँह फेर लिया और बोली, “इतने भी अच्छे नहीं हैं तेरे जूते। लाइटें तो बच्चों वाली हैं।” नेहा का चेहरा उतर गया।

घर जाकर सान्वी को अच्छा नहीं लगा। उसने मम्मी को सब बताया और पूछा, “मम्मी, मैंने ऐसा क्यों कहा? मुझे तो नेहा के जूते अच्छे लगे थे।” मम्मी ने उसे गोद में बिठाया, “इसे जलन कहते हैं, बेटा। जब किसी और के पास कुछ ऐसा हो जो हमारे पास नहीं, तो यह भावना सबको आती है — बड़ों को भी। पर इसे कड़वी बातों में बदलने की जगह हम खुश होना सीख सकते हैं। दोस्त की खुशी में खुश होना सबसे अच्छी दोस्ती है।”

अगले दिन सान्वी नेहा के पास गई। “नेहा, सॉरी। सच कहूँ तो तेरे जूते बहुत सुंदर हैं। मुझे थोड़ी जलन हो गई थी, इसलिए उल्टा बोल दिया।” नेहा ने उसे गले लगा लिया। फिर वह बोली, “चल, आज हम अँधेरे कमरे में जाकर कूदेंगे और लाइट का डिस्को करेंगे!”

उस दिन दोनों ने लाइब्रेरी के पीछे वाले कोने में जाकर खूब कूद-फांद की — एक के जूतों की रोशनी में दोनों की हँसी चमक रही थी।

कहानी की सीख

जलन होना स्वाभाविक है, पर उसे कड़वी बातों में मत बदलो। दूसरों की खुशी में खुश होना सीखो — यही सच्ची दोस्ती है।

37

दोस्त का राज़

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

आरव और विहान एक-दूसरे को सब कुछ बताते थे। एक दिन विहान ने धीरे से आरव के कान में कहा, “किसी को मत बताना… मुझे अभी भी रात को अपना पुराना टेडी बियर लेकर सोना पड़ता है। उसका नाम गोलू-मोलू है।” आरव ने वादा किया, “पक्का, किसी को नहीं बताऊँगा।”

उसी दिन लंच में कुछ बच्चे बातें कर रहे थे कि कौन सबसे बहादुर है। हर कोई अपनी बहादुरी के किस्से सुना रहा था। सबका ध्यान खींचने के लिए आरव के मुँह से निकल गया, “विहान तो अभी भी टेडी बियर लेकर सोता है — गोलू-मोलू!” सब बच्चे हँसने लगे और विहान को “गोलू-मोलू” कहकर चिढ़ाने लगे।

विहान ने आरव की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, दुख था। वह बिना कुछ कहे उठकर चला गया। आरव का दिल डूब गया। उसे लगा कि उसने एक पल की हँसी के लिए अपने सबसे प्यारे दोस्त का भरोसा तोड़ दिया था।

आरव ने गलती मानी

आरव सब बच्चों के सामने खड़ा हुआ और बोला, “रुको! मैंने गलत किया। वह विहान का राज़ था। और सच बताऊँ? मैं भी अपनी नीली कम्बल के बिना नहीं सो पाता।” फिर एक-एक करके बाक़ी बच्चों ने भी माना — किसी के पास तकिया था, किसी के पास खिलौना कुत्ता। सब हँस पड़े, पर इस बार किसी का मज़ाक नहीं उड़ रहा था।

आरव विहान के पास गया, “सॉरी, मैंने तेरा भरोसा तोड़ा। क्या तू मुझे एक मौका और देगा?” विहान ने थोड़ी देर सोचा, फिर मुस्कुराया, “ठीक है। पर अब गोलू-मोलू तुझसे थोड़ा नाराज़ रहेगा!” आरव ने सीख लिया कि दोस्त का राज़ संभालना दोस्ती का सबसे ज़रूरी हिस्सा है।

कहानी की सीख

दोस्त का भरोसा सबसे कीमती चीज़ है। हँसी के लिए किसी का राज़ मत खोलो। (पर अगर कोई राज़ किसी को नुकसान पहुँचा रहा हो, तो उसे हमेशा मम्मी-पापा या टीचर को बताना चाहिए।)

38

भूला हुआ टिफ़िन

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

उस सुबह कृष के घर में बड़ी भागदौड़ थी। उसकी नन्ही बहन की तबीयत ख़राब थी और मम्मी-पापा उसे डॉक्टर के पास ले जाने की तैयारी में थे। इसी हड़बड़ी में कृष का टिफ़िन रसोई की मेज़ पर ही छूट गया।

लंच की घंटी बजी। सब बच्चों ने अपने टिफ़िन खोले और क्लास में पराठे, पोहा और सैंडविच की खुशबू फैल गई। कृष ने बस्ता टटोला — टिफ़िन नहीं था। उसके पेट में चूहे कूद रहे थे, पर उसने किसी से कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप खिड़की से बाहर देखने लगा, जैसे उसे भूख ही न हो।

पिंकी ने यह देखा। उसके टिफ़िन में तीन आलू के पराठे थे। उसने एक पराठा अपने ढक्कन पर रखा और कृष की तरफ़ बढ़ाया, “लो, मेरी मम्मी हमेशा एक ज़्यादा रखती हैं।” कृष ने शर्माते हुए ले लिया। पिंकी को देखकर सारा ने अपने टिफ़िन से थोड़ा अचार दिया, गोलू ने एक केला, और लक्ष्मी ने दो इडली।

देखते ही देखते कृष के सामने ऐसा स्वादिष्ट खाना था जैसा किसी दावत में होता है। सब मिलकर हँसते-बातें करते खाने लगे। कृष ने कहा, “आज तो टिफ़िन भूलना सबसे अच्छी भूल निकली!”

अगले दिन कृष की मम्मी ने पूरे ग्रुप के लिए मीठे सूजी के लड्डू भेजे, साथ में एक छोटी-सी पर्ची — “मेरे बेटे का ख़्याल रखने के लिए धन्यवाद।” उस दिन से उन बच्चों का एक नियम बन गया — अगर किसी का टिफ़िन छूट जाए, तो कोई भूखा नहीं रहेगा।

कहानी की सीख

जिसे ज़रूरत हो, उसके साथ बाँटो — भले वह माँगे नहीं। बाँटकर खाने का स्वाद सबसे अच्छा होता है।

39

छोटू भी खेलेगा

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

कॉलोनी के बड़े बच्चे रोज़ शाम को फ़ुटबॉल खेलते थे। सात साल का रोहन उनकी टीम का कप्तान था। हर शाम एक छोटा-सा लड़का, चार साल का छोटू, मैदान के किनारे खड़ा होकर उन्हें देखता रहता। एक दिन उसने हिम्मत करके पूछा, “क्या मैं भी खेल सकता हूँ?”

रोहन ने हँसकर कहा, “तू तो बहुत छोटा है। गेंद लग गई तो रोने लगेगा। जा, घर जाकर खिलौनों से खेल।” बाक़ी बच्चे भी हँस पड़े। छोटू का चेहरा लटक गया और वह सिर झुकाकर चला गया। रोहन को उस समय कुछ ख़ास नहीं लगा।

रात को खाने पर रोहन के पापा ने अपने बचपन की एक कहानी सुनाई, “जब मैं छोटा था, तो बड़े लड़के मुझे क्रिकेट में नहीं लेते थे। मैं कितने ही दिन किनारे खड़ा रहा। फिर एक दिन एक भैया ने मुझे बुलाया और फ़ील्डिंग दी। उस दिन मैं इतना खुश था कि आज तक याद है।” रोहन चुपचाप सुनता रहा। उसे छोटू का लटका हुआ चेहरा याद आ गया।

अगली शाम जब छोटू फिर किनारे खड़ा था, तो रोहन खुद उसके पास गया। “छोटू, हमें एक ख़ास खिलाड़ी चाहिए — गोलकीपर का सहायक! जब गेंद बाहर जाए, तो तुम दौड़कर लाना। और हर गोल के बाद तुम सीटी बजाओगे।” छोटू की आँखें खुशी से चमक उठीं।

छोटू ने पूरे खेल में इतनी मेहनत से गेंद लाकर दी कि सबने उसकी तारीफ़ की। खेल के आख़िर में रोहन ने उसे एक पेनल्टी किक भी मारने दी — और छोटू ने गोल कर दिया! पूरे मैदान में “छोटू! छोटू!” के नारे गूँज उठे। रोहन को लगा कि आज की सबसे बड़ी जीत उसकी नहीं, छोटू की थी।

कहानी की सीख

किसी को छोटा समझकर अकेला मत छोड़ो। सबको शामिल करने का तरीका ढूँढो — अकेलेपन का दुख हर उम्र में एक-सा होता है।

40

टूटा हुआ वादा

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • दोस्ती और बाँटना

सारा ने अपनी सहेली तन्वी से वादा किया था, “रविवार को तेरे जन्मदिन की पार्टी में सबसे पहले आऊँगी और सजावट में मदद करूँगी।” तन्वी बहुत खुश थी। उसने सारा के लिए खास तौर पर एक गुब्बारे वाला ताज बनाया था।

पर शनिवार को सारा की दूसरी सहेली काव्या ने कहा, “कल हम मॉल में नई फ़िल्म देखने जा रहे हैं, तू भी चलेगी? पॉपकॉर्न भी मिलेगा!” सारा लालच में आ गई। उसने सोचा, “पार्टी में तो बहुत सारे लोग होंगे, मेरे न जाने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा?” और वह फ़िल्म देखने चली गई।

फ़िल्म मज़ेदार थी, पर सारा का मन बार-बार तन्वी की तरफ़ जा रहा था। शाम को घर लौटी तो मम्मी ने बताया कि तन्वी की मम्मी का फ़ोन आया था — तन्वी पूरी पार्टी में दरवाज़े की तरफ़ देखती रही और केक काटते समय रो पड़ी। सारा को लगा जैसे किसी ने उसके दिल पर भारी पत्थर रख दिया हो।

वादे का धागा

मम्मी ने कहा, “वादा एक धागे की तरह होता है, बेटा। टूट जाए तो जुड़ तो सकता है, पर गाँठ रह जाती है। अब सोचो, तुम इसे कैसे ठीक करोगी?” सारा ने अपनी गुल्लक से पैसे निकाले, एक छोटा-सा तोहफ़ा खरीदा, और अपने हाथों से एक कार्ड बनाया — “मैंने गलती की। मैं अपना वादा भूल गई। मुझे माफ़ कर दो।”

तन्वी ने कार्ड पढ़ा और कुछ देर चुप रही। फिर उसने अलमारी से वह गुब्बारे वाला ताज निकाला और सारा के सिर पर रख दिया, “यह तेरे लिए था। अगली बार वादा निभाना।” सारा ने उस दिन से तय किया कि वह वही वादा करेगी जो निभा सके, और जो वादा करेगी उसे हर हाल में निभाएगी।

कहानी की सीख

वादा सोच-समझकर करो और उसे निभाओ। अगर वादा टूट जाए, तो सच्चे मन से माफ़ी माँगो और भरोसा दोबारा जीतने की कोशिश करो।

अच्छी आदतों और समझदारी की नैतिक कहानियाँ

41

दाँतों का किला

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

गोलू को रात को दाँत माँजना बिल्कुल पसंद नहीं था। हर रात वह कोई न कोई बहाना बनाता — “मुझे नींद आ रही है”, “मैंने सुबह तो माँजे थे”, “ब्रश गीला है”। और सोने से पहले वह चुपके से एक चॉकलेट भी खा लेता।

एक दिन उसके दाढ़ में ज़ोर का दर्द हुआ। वह ठीक से खाना भी नहीं खा पा रहा था। मम्मी उसे दाँतों की डॉक्टर के पास ले गईं। डॉक्टर दीदी ने उसके मुँह में छोटा-सा शीशा डालकर देखा और बोलीं, “गोलू, तुम्हारे मुँह में एक किला है — बत्तीस सफ़ेद सिपाहियों का किला। रात को जब तुम सोते हो, तो छोटे-छोटे कीटाणु अंदर घुस आते हैं और चॉकलेट के बचे हुए टुकड़े खाकर दीवारों में छेद करते हैं। देखो, एक सिपाही को चोट लग गई है।”

गोलू की आँखें गोल हो गईं, “तो कीटाणुओं को भगाएँगे कैसे?” डॉक्टर दीदी ने उसे एक नीला ब्रश दिया, “यह है तुम्हारी तलवार। सुबह और रात, दो मिनट तक — ऊपर-नीचे, गोल-गोल, आगे-पीछे। और रात को ब्रश के बाद कुछ मीठा नहीं।” उन्होंने गोलू के दाँत का इलाज किया और उसे एक स्टिकर दिया — “दाँतों का सेनापति”।

उस रात गोलू ने खुद ब्रश उठाया और शीशे के सामने खड़े होकर बोला, “चलो सिपाहियों, कीटाणुओं से लड़ाई का समय!” उसने दो मिनट का गाना गुनगुनाते हुए दाँत माँजे। अब हर रात वह अपने छोटे भाई को भी साथ लेकर किले की रक्षा करता है। अगली बार जब वह डॉक्टर दीदी के पास गया, तो उन्होंने कहा, “शाबाश सेनापति! तुम्हारा किला एकदम मज़बूत है।”

कहानी की सीख

सुबह और रात दाँत माँजना छोटी-सी आदत है, पर यह हमें बड़े दर्द से बचाती है। अपने शरीर का ध्यान रखना हमारी अपनी ज़िम्मेदारी है।

42

चिप्स वाला हफ़्ता

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

आरव को हरी सब्ज़ियाँ बिल्कुल पसंद नहीं थीं। उसे बस चिप्स, नूडल्स और कोल्ड ड्रिंक चाहिए थे। एक दिन उसने खाने की थाली देखकर ज़िद की, “मैं यह दाल-सब्ज़ी नहीं खाऊँगा! मुझे रोज़ सिर्फ़ चिप्स चाहिए!” मम्मी ने पापा की तरफ़ देखा, और पापा मुस्कुराए, “ठीक है। एक हफ़्ते का प्रयोग करते हैं। हर शाम तुम्हें चिप्स मिलेंगे, पर तुम हर दिन अपनी डायरी में लिखोगे कि तुम्हें कैसा लग रहा है।”

पहले दिन आरव ने लिखा, “बहुत मज़ा आया!” दूसरे दिन, “अच्छा था।” तीसरे दिन उसने लिखा, “फ़ुटबॉल में जल्दी थक गया।” चौथे दिन, “पेट में अजीब लग रहा है। प्यास बहुत लगती है।” पाँचवें दिन स्कूल में उसका सिर भारी था और क्लास में उसे नींद आती रही। चिप्स अब उतने मज़ेदार भी नहीं लग रहे थे।

छठे दिन उसने देखा कि उसकी दीदी, जो रोज़ दाल-रोटी-सब्ज़ी और फल खाती थी, साइकिल पर पूरी कॉलोनी के चक्कर लगा रही थी। आरव ने पूछा, “दीदी, तुम थकती क्यों नहीं?” दीदी ने हँसकर कहा, “क्योंकि मेरे शरीर की गाड़ी में अच्छा पेट्रोल है — दाल, सब्ज़ी, दूध, फल। चिप्स तो बस कभी-कभी का मज़ा हैं।”

उस रात आरव ने खुद मम्मी से कहा, “मम्मी, कल से दाल-रोटी। पर क्या सब्ज़ी में थोड़ा पनीर डाल सकती हो?” मम्मी हँस पड़ीं। अब आरव के घर में एक नियम है — हफ़्ते भर सेहतमंद खाना, और रविवार को एक “मज़े वाला स्नैक”। और फ़ुटबॉल में आरव अब सबसे आख़िर तक दौड़ता है।

कहानी की सीख

जो स्वाद में अच्छा हो, ज़रूरी नहीं कि शरीर के लिए भी अच्छा हो। सेहतमंद खाना हमें ताक़त देता है; मीठा और चटपटा कभी-कभार ही अच्छा है।

43

स्क्रीन का भूत

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

मीरा को मम्मी का फ़ोन बहुत पसंद था। सुबह उठते ही वह कार्टून देखने लगती, खाना खाते समय गेम खेलती, और रात को सोने से पहले वीडियो देखती। अगर कोई फ़ोन ले लेता, तो वह रो-रोकर घर सिर पर उठा लेती।

धीरे-धीरे कुछ अजीब होने लगा। मीरा की आँखें जलने लगीं और सिर में दर्द रहने लगा। वह बात-बात पर चिड़चिड़ी हो जाती। उसकी सहेलियाँ पार्क में बुलातीं, तो वह कहती, “अभी नहीं, बस एक वीडियो और।” एक दिन सहेलियों ने बुलाना ही बंद कर दिया।

दादी ने मीरा को एक कहानी सुनाई, “एक था स्क्रीन का भूत। वह बच्चों से उनका समय चुराता था — खेलने का समय, सोने का समय, दोस्तों का समय। और बच्चों को पता भी नहीं चलता था। उसे हराने का एक ही तरीका था — उसे समय की सीमा में बाँध दो।” मीरा सोच में पड़ गई। उसे याद आया कि उसने कितने दिनों से साइकिल नहीं चलाई थी।

मीरा और मम्मी ने मिलकर एक सारणी बनाई — सिर्फ़ शाम को आधा घंटा स्क्रीन, खाने के समय फ़ोन नहीं, और सोने से पहले किताब। पहले दो-तीन दिन बहुत मुश्किल लगे। पर फिर मीरा ने देखा कि उसके पास कितना सारा समय है! उसने पेंटिंग की, दादी के साथ लूडो खेला, और पार्क में सहेलियों के साथ रस्सी कूदी।

एक हफ़्ते में उसकी आँखों की जलन चली गई, नींद अच्छी आने लगी, और चिड़चिड़ापन भी कम हो गया। एक दिन उसने खुद फ़ोन मम्मी को लौटाते हुए कहा, “आज का आधा घंटा पूरा। भूत हार गया!”

कहानी की सीख

फ़ोन और टीवी सीमित समय के लिए ठीक हैं। असली खेल, असली दोस्त और अच्छी नींद स्क्रीन से कहीं ज़्यादा कीमती हैं।

44

टपकता नल

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

विहान के स्कूल में उस दिन “पानी बचाओ” पर एक क्लास हुई। टीचर ने बताया कि हमारे देश में बहुत से गाँवों में लोगों को पानी लाने के लिए मीलों चलना पड़ता है। विहान ने सोचा, “हमारे घर में तो नल खोलो और पानी आ जाता है। हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है?”

उस रात विहान को बाथरूम से “टप… टप… टप…” की आवाज़ सुनाई दी। नल ठीक से बंद नहीं था। उसने एक प्रयोग किया — नल के नीचे एक बाल्टी रख दी। सुबह उठकर देखा तो वह हैरान रह गया — बाल्टी आधी भर चुकी थी! “बस एक रात में इतना पानी? यह तो किसी के पूरे दिन का पीने का पानी है!”

विहान ने पापा को बुलाया और उसी दिन नल ठीक करवाया। फिर उसने पूरे घर में “पानी जासूस” बनकर खोज शुरू की। उसने देखा कि पापा दाढ़ी बनाते समय नल खुला छोड़ते हैं, दीदी ब्रश करते समय, और खुद वह नहाते समय शॉवर में खेलता रहता है। उसने एक चार्ट बनाया और दरवाज़े पर चिपका दिया — “ब्रश करते समय नल बंद, मग से कुल्ला, बाल्टी से स्नान।”

सबने उसकी बात मानी। मम्मी ने सब्ज़ियाँ धोने का पानी पौधों में डालना शुरू किया। महीने के आख़िर में पापा ने पानी का बिल दिखाया — पिछले महीने से काफ़ी कम था। टीचर ने विहान का चार्ट क्लास की दीवार पर भी लगाया, और अब पूरी क्लास “पानी जासूस” बन चुकी है।

कहानी की सीख

बूँद-बूँद से सागर बनता है — और बूँद-बूँद से ही बर्बाद भी होता है। पानी की हर बूँद कीमती है, इसे बचाना हम सबका काम है।

45

कचरा कहाँ जाए?

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

रविवार को अनाया और उसका भाई अर्जुन पार्क में पिकनिक मनाने गए। उन्होंने चिप्स, जूस और सैंडविच खाए। खाने के बाद अर्जुन ने चिप्स का खाली पैकेट घास पर ही फेंक दिया। “कौन कूड़ेदान तक जाए? इतना सारा कचरा पहले से पड़ा है, एक और से क्या होगा?”

अनाया ने इधर-उधर देखा। सच में पार्क में हर तरफ़ प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें और रैपर पड़े थे। तभी उसने देखा कि एक गाय घास के साथ एक प्लास्टिक की थैली चबा रही है। माली काका दौड़कर आए और थैली खींचकर निकाली। उन्होंने उदास होकर कहा, “लोग कचरा फेंक देते हैं, और ये बेज़ुबान जानवर उसे खाकर बीमार हो जाते हैं।”

अर्जुन ने यह सुना और उसका चेहरा उतर गया। उसने चुपचाप अपना फेंका हुआ पैकेट उठाया। अनाया ने कहा, “भैया, क्या हम थोड़ा और कचरा उठा लें?” पापा ने गाड़ी से दस्ताने और एक बड़ा थैला निकाला। तीनों ने आधे घंटे में पार्क का एक कोना पूरा साफ़ कर दिया। उन्हें देखकर दो और परिवार भी जुड़ गए।

उस दिन के बाद अनाया और अर्जुन ने अपनी सोसायटी में “हर रविवार सफ़ाई” क्लब शुरू किया। अब अर्जुन की जेब में हमेशा एक छोटी-सी थैली रहती है — अगर कूड़ेदान दूर हो, तो कचरा उसी में जाता है।

कहानी की सीख

“एक से क्या होगा” सोचना गलत है — सफ़ाई भी एक से ही शुरू होती है। कचरा हमेशा कूड़ेदान में डालो।

46

पाँच मिनट और

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

कबीर का पसंदीदा वाक्य था — “बस पाँच मिनट और!” सुबह अलार्म बजता तो वह कहता, “पाँच मिनट और।” नहाने को कहा जाता, तो “पाँच मिनट और।” होमवर्क के लिए बुलाया जाता, तो फिर वही — “पाँच मिनट और!”

उस दिन स्कूल का पिकनिक था — चिड़ियाघर की सैर! बस सुबह सात बजे स्कूल से निकलनी थी। अलार्म बजा, पर कबीर ने कहा, “पाँच मिनट और…” और फिर से सो गया। मम्मी ने उठाया, तो फिर पाँच मिनट। नाश्ता करते समय वह कार्टून देखने लगा — और पाँच मिनट। जूते ढूँढने में पाँच मिनट, बोतल ढूँढने में पाँच मिनट।

जब वह दौड़ता-हाँफता स्कूल पहुँचा, तो गेट पर सिर्फ़ चौकीदार अंकल खड़े थे। “बस तो दस मिनट पहले निकल गई, बेटा।” कबीर वहीं सीढ़ियों पर बैठ गया और रो पड़ा। उसके सारे दोस्त आज शेर, हाथी और जिराफ़ देखेंगे, और वह यहाँ अकेला था।

घर लौटते हुए मम्मी ने काग़ज़ पर हिसाब लगाया, “आज सुबह तुमने कितनी बार ‘पाँच मिनट और’ कहा? छह बार। छह गुणा पाँच — पूरे तीस मिनट। और बस सिर्फ़ दस मिनट से छूटी।” कबीर को पहली बार समझ आया कि छोटे-छोटे पाँच मिनट मिलकर कितना बड़ा समय बन जाते हैं।

उस रात कबीर ने अपना बस्ता, कपड़े और जूते पहले से तैयार करके रखे और जल्दी सो गया। अगली सुबह अलार्म बजा तो उसने खुद से कहा, “पाँच मिनट कम!” और उठ गया। अगले महीने जब क्लास का अगला पिकनिक आया, तो बस में सबसे पहले पहुँचने वाला बच्चा कबीर ही था।

कहानी की सीख

समय किसी का इंतज़ार नहीं करता। टालमटोल करने से अच्छे मौके छूट जाते हैं; समय पर काम करना सबसे अच्छी आदत है।

47

अजनबी की चॉकलेट

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

रिया अपनी मम्मी के साथ बाज़ार गई थी। मम्मी एक दुकान पर कपड़े देख रही थीं और रिया दरवाज़े के पास खिलौनों वाली खिड़की को देख रही थी। तभी एक अनजान आदमी उसके पास आया। उसने मुस्कुराकर एक बड़ी-सी चॉकलेट आगे बढ़ाई, “यह लो बेटा। और उधर गाड़ी में और भी खिलौने हैं, चलो दिखाता हूँ।”

चॉकलेट रिया को बहुत पसंद थी। एक पल के लिए उसका हाथ आगे बढ़ा। पर तभी उसे मम्मी-पापा की सिखाई हुई “सुरक्षा की तीन बातें” याद आईं — अनजान लोगों से कुछ मत लो; किसी के साथ कहीं मत जाओ; और तुरंत किसी भरोसेमंद बड़े को बताओ।

रिया ने हाथ पीछे खींच लिया और ज़ोर से बोली, “नहीं, धन्यवाद!” फिर वह दौड़कर दुकान के अंदर मम्मी के पास गई और उनका हाथ कसकर पकड़ लिया, “मम्मी, वह अंकल मुझे चॉकलेट दे रहे थे और गाड़ी की तरफ़ बुला रहे थे।” मम्मी ने तुरंत दुकानदार और बाज़ार के गार्ड को बताया। वह आदमी तब तक वहाँ से जा चुका था।

मम्मी की शाबाशी

मम्मी ने रिया को कसकर गले लगाया। “तुमने बिल्कुल सही किया। तुमने ‘नहीं’ कहा, तुम दूर हटीं, और तुरंत मुझे बताया। अगर कभी मैं पास न होऊँ, तो किसी दुकानदार, गार्ड या बच्चों के साथ खड़ी किसी आंटी के पास जाना।” घर आकर मम्मी ने रिया को उसकी पसंदीदा चॉकलेट दी और कहा, “यह है हिम्मत वाली चॉकलेट — अपनों के हाथ से।”

उस दिन से रिया और उसके पापा ने मिलकर एक “परिवार का गुप्त शब्द” भी तय किया — अगर कभी कोई कहे कि मम्मी-पापा ने उसे लेने भेजा है, तो रिया वह शब्द पूछेगी। शब्द नहीं पता, तो साथ नहीं जाना।

कहानी की सीख

अनजान लोगों से कुछ मत लो और उनके साथ कहीं मत जाओ। अगर कुछ अजीब लगे, तो “नहीं” कहो, दूर हटो, और तुरंत किसी भरोसेमंद बड़े को बताओ।

48

बंदर और मगरमच्छ

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

एक नदी के किनारे जामुन का एक बड़ा पेड़ था, जिस पर रक्तमुख नाम का एक समझदार बंदर रहता था। हर दिन नदी से एक मगरमच्छ किनारे पर आकर आराम करता। बंदर उसे मीठे-मीठे जामुन फेंकता, और धीरे-धीरे दोनों अच्छे दोस्त बन गए। मगरमच्छ कुछ जामुन अपनी पत्नी के लिए भी ले जाता।

मगरमच्छ की पत्नी लालची थी। उसने सोचा, “जो बंदर इतने मीठे फल खाता है, उसका दिल तो और भी मीठा होगा।” उसने मगरमच्छ से कहा, “अपने दोस्त को घर ले आओ। मुझे उसका दिल खाना है।” मगरमच्छ ने मना किया, पर पत्नी की ज़िद के आगे हार गया।

अगले दिन मगरमच्छ ने बंदर से कहा, “दोस्त, मेरी पत्नी तुमसे मिलना चाहती है। मेरी पीठ पर बैठो, मैं तुम्हें नदी पार अपने घर ले चलता हूँ।” बंदर खुशी-खुशी बैठ गया। नदी के बीचों-बीच पहुँचकर मगरमच्छ ने सोचा कि अब बंदर भाग नहीं सकता, और उसने सच बता दिया, “मेरी पत्नी तुम्हारा दिल खाना चाहती है।”

बंदर का दिल डर से काँप गया, पर उसने घबराहट नहीं दिखाई। उसने शांति से कहा, “अरे दोस्त, यह बात पहले क्यों नहीं बताई? हम बंदर तो अपना दिल पेड़ पर संभालकर रखते हैं! चलो वापस, लेकर आता हूँ।” भोला मगरमच्छ उसे वापस किनारे ले आया। जैसे ही किनारा आया, बंदर छलाँग मारकर पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर चढ़ गया।

वहाँ से उसने कहा, “मूर्ख मगरमच्छ, कोई अपना दिल शरीर से बाहर कैसे रख सकता है? तुमने दोस्ती का भरोसा तोड़ा। अब हमारी दोस्ती ख़त्म।” मगरमच्छ शर्मिंदा होकर पानी में चला गया। रक्तमुख ने समझदारी से अपनी जान बचा ली।

कहानी की सीख

मुसीबत में घबराने की जगह शांत दिमाग़ से सोचो, तो रास्ता ज़रूर मिलता है। और सच्चा दोस्त कभी धोखा नहीं देता। (पंचतंत्र की कथा पर आधारित)

49

गुल्लक का सपना

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

अनाया को साइकिल के आगे लगने वाली एक गुलाबी टोकरी बहुत पसंद थी, जो दुकान में डेढ़ सौ रुपये की थी। उसने पापा से कहा, “पापा, मुझे वह टोकरी चाहिए!” पापा ने कहा, “ठीक है, पर इस बार तुम खुद पैसे जोड़ोगी।” उन्होंने उसे मिट्टी की एक गुल्लक दी, जिस पर एक मुस्कुराता हाथी बना था।

अनाया को हर हफ़्ते दस रुपये जेब-खर्च मिलते थे, और वह अक्सर उनसे स्कूल के बाहर से टॉफ़ियाँ खरीद लेती थी। पहले हफ़्ते उसने सिर्फ़ पाँच रुपये गुल्लक में डाले। दूसरे हफ़्ते उसने सोचा, “अगर मैं टॉफ़ी न खाऊँ, तो टोकरी जल्दी आएगी।” उसने पूरे दस रुपये डाले। उसने दीवार पर एक चार्ट भी बनाया — हर दस रुपये पर एक सितारा।

दादी के जन्मदिन पर उसे मामा से पचास रुपये मिले। उसका मन हुआ कि मेले में झूले पर खर्च कर दे। पर फिर उसने दीवार पर लगे सितारे देखे — सिर्फ़ चार सितारे और चाहिए थे! उसने आधे पैसे गुल्लक में डाले और आधे से एक छोटा-सा झूला झूल आई। पापा ने कहा, “यह हुई समझदारी — थोड़ा आज के लिए, थोड़ा कल के लिए।”

तीन महीने बाद गुल्लक भारी हो गई। अनाया ने पापा के साथ उसे खोला और पैसे गिने — एक सौ साठ रुपये! वह खुद दुकान पर गई, अपने पैसों से टोकरी खरीदी, और बचे हुए दस रुपये से दादी के लिए एक गुलाब का फूल भी। उस टोकरी को साइकिल पर लगाते हुए उसे जो खुशी हुई, वह किसी तोहफ़े से कभी नहीं हुई थी — क्योंकि यह उसकी अपनी मेहनत की थी।

कहानी की सीख

जो चाहिए, उसके लिए धीरे-धीरे बचत करो। हर चीज़ तुरंत नहीं मिलती, पर इंतज़ार और बचत से मिली खुशी सबसे मीठी होती है।

50

धन्यवाद की डायरी

  • 3–7 साल
  • 3–4 मिनट
  • अच्छी आदतें और समझदारी

सारा को लगता था कि उसके पास कुछ अच्छा है ही नहीं। उसकी सहेली के पास बड़ा घर था, दूसरी सहेली हर छुट्टी में घूमने जाती थी, और तीसरी के पास ढेर सारे खिलौने थे। हर रात वह मम्मी से शिकायत करती, “मेरे पास कुछ भी नहीं है।”

एक दिन मम्मी उसके लिए एक छोटी-सी पीली डायरी लाईं। उसके पहले पन्ने पर लिखा था — “धन्यवाद की डायरी”। मम्मी ने कहा, “हर रात सोने से पहले इसमें तीन चीज़ें लिखना जिनके लिए तुम आज खुश हो। छोटी से छोटी चीज़ भी चलेगी।”

पहली रात सारा को कुछ समझ नहीं आया। बड़ी मुश्किल से उसने लिखा — “आज खाने में राजमा बना था।” दूसरी रात उसने लिखा — “तन्वी ने अपनी पेंसिल दी। बारिश हुई। पापा ने कहानी सुनाई।” धीरे-धीरे उसे दिन भर में ऐसी चीज़ें दिखने लगीं जिनकी तरफ़ उसका ध्यान पहले कभी नहीं जाता था — दादी की हँसी, बालकनी में आई तितली, टीचर की तारीफ़, गरम-गरम दूध, मुलायम रज़ाई।

एक महीने बाद सारा की डायरी आधी भर चुकी थी। उसने उसे शुरू से पढ़ा और हैरान रह गई — नब्बे से ज़्यादा खुशियाँ! उस रात उसने मम्मी से कहा, “मम्मी, मेरे पास तो बहुत कुछ है। बस मैं उसे देखती नहीं थी।” फिर उसने डायरी का अगला पन्ना खोला और लिखा — “आज मैं उस डायरी के लिए खुश हूँ जिसने मुझे खुश रहना सिखाया।”

कहानी की सीख

खुशी ज़्यादा चीज़ें पाने में नहीं, जो है उसके लिए धन्यवाद कहने में है। रोज़ छोटी-छोटी खुशियाँ गिनो, तो दिल हमेशा भरा रहता है।

नैतिक कहानियाँ कैसे सुनाएँ कि सीख याद रह जाए

  1. सुनाइए, समझाइए मत। कहानी को अपना काम करने दें। अंत में सीख एक बार बताएँ और रुक जाएँ — लंबा भाषण कहानी का जादू ख़त्म कर देता है।
  2. आवाज़ें और ठहराव। चिड़िया की पतली आवाज़, शर्मा चाचा की भारी आवाज़, “छनाक!” से पहले एक पल का ठहराव — बच्चे वही कहानियाँ याद रखते हैं जिन्हें वे सुन सकें।
  3. उनके दिन से जोड़िए। “याद है तुमने आर्यन के साथ बिस्किट बाँटा था? बिल्कुल रिया और क्रेयॉन जैसा!”
  4. पसंदीदा कहानी बार-बार। बच्चों को एक ही कहानी कई बार सुनना अच्छा लगता है। हर बार सीख गहरी होती है — उन्हें कहानी का कुछ हिस्सा आपको सुनाने दें।
  5. अपनी बोली में सुनाइए। हिंदी, अवधी, भोजपुरी या घर की कोई भी बोली — बच्चे के लिए सबसे अपनी भाषा ही सबसे असरदार है।

किसी भी कहानी के बाद पूछने वाले सवाल

कहानी के बाद एक अच्छा सवाल सुनने को सोचने में बदल देता है। बस एक सवाल चुनें — कोई जवाब गलत नहीं होता।

  • तुम्हें कौन-सा पात्र सबसे अच्छा लगा? क्यों?
  • अंत में उसे कैसा लगा होगा?
  • तुम उसकी जगह होते तो क्या करते?
  • क्या कभी तुम्हारे साथ ऐसा हुआ है?
  • क्या तुम कहानी का कोई और अंत सोच सकते हो?
  • अपने शब्दों में बताओ, कहानी ने क्या सिखाया?

Moral Stories in Hindi: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

3 से 5 साल के बच्चों के लिए सबसे अच्छी नैतिक कहानियाँ कौन-सी हैं?

जिनमें एक पात्र हो और एक साफ़ फ़ैसला हो — जैसे प्यासी चिड़िया, चींटियों की कतार और अँधेरे का राक्षस। सीख को एक छोटे वाक्य में बताएँ।

सोते समय की कहानी कितनी लंबी होनी चाहिए?

3 से 7 साल के बच्चों के लिए पढ़कर सुनाने में 2 से 5 मिनट की कहानी सबसे अच्छी रहती है। इतने में शुरुआत, एक फ़ैसला और अंत आ जाता है, और बच्चे का ध्यान भी बना रहता है।

बच्चों के लिए नैतिक कहानियाँ क्यों ज़रूरी हैं?

नैतिक कहानियाँ ईमानदारी, दया और हिम्मत जैसे गुणों को ऐसे पात्रों के ज़रिए दिखाती हैं जिनसे बच्चे जुड़ पाते हैं। बच्चे नियम से ज़्यादा कहानी की भावना याद रखते हैं, और साथ पढ़ने से शब्द-भंडार व रिश्ता दोनों मज़बूत होते हैं।

क्या सीख मुझे खुद बतानी चाहिए या बच्चे को ढूँढने दूँ?

दोनों, हल्के अंदाज़ में। पहले एक खुला सवाल पूछें (“तुमने क्या सीखा?”), बच्चे की बात सुनें, फिर एक वाक्य में सीख बताएँ। इसे भाषण न बनाएँ।

क्या ये कहानियाँ अपनी बोली में सुना सकते हैं?

हाँ, ज़रूर। कहानी के शब्द अपनी बोली में बदल लें — बच्चे के लिए घर की भाषा सबसे अपनी होती है और सीख जल्दी समझ आती है।

हफ़्ते में कितनी नैतिक कहानियाँ सुनानी चाहिए?

रोज़ एक छोटी कहानी, या हफ़्ते में तीन-चार कहानियाँ काफ़ी हैं, बस नियमित रहें। बच्चे की पसंदीदा कहानी दोबारा सुनाना भी उतना ही फ़ायदेमंद है जितना नई कहानी।

कहानी को रोज़ की आदत बनाइए

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